• [EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 02 May, 2019 07:36 AM | Total Read Count 124
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केजरीवाल के ‘ठग्गू के लड्डू’ बासी

पिछले कुछ वर्षों में कानपुर के ‘ठग्गू के लड्डू’ काफी चर्चित हुए हैं। इसकी एक वजह एक हिंदी फिल्म में इन लड्डुओ और दुकान को एक गाने में फिल्माया जाना था। मेरा बचपन वहीं कटा और वहां रहते हुए मैंने कभी इन लड्डुओं की तारीफ नहीं सुनी थी। इस बार जा कर उन्हें खाया तो पता चला कि लड्डू वाले ने अपनी दुकान के बोर्ड के नीचे जो यह नारा लिखा हे कि ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं। उस पर एकदम सटीक ठहरता है। क्योंकि यह लड्डू जितने चर्चित है उतने ही एकदम सामान्य है और इन्हें खाकर ऐसा नहीं लगता है कि आप कोई विशेष चीज खा रहे हैं। 

जब आप पार्टी बनी तब अरविंद केजरीवाल व अन्ना की बातों को सुन कर ऐसा लगता था कि शायद यह पार्टी तमाम मामलों में अन्य दलों से अलग होगी। मगर जब अरविंद केजरीवाल ने अपनी पार्टी को ठग्गू के लड्डू बनाते हुए अन्ना से लेकर आशुतोष तक को किनारे लगा दिया तब मुझे लगा कि इसके खाने के दांत अलग व दिखाने के अलग है। हालांकि इस पार्टी को लेकर मुझे कोई संदेह नहीं था व मैं शुरू से ही यह लिख रहा था कि भविष्य में उनका क्या होगा। 

मुझे लगता था कि शायद यह पार्टी जातिवाद से अलग होगी। मगर अरविंद केजरीवाल से लेकर आतिशी मर्लीनी तक ने यह साबित कर दिया कि देश के अन्य राजनीतिक दलों की तरह वे भी जातिवाद को बहुत अहमियत देते हैं। अरविंद केजरीवाल ने तो शुरू मे ही अपनी पार्टी को बनियो की पार्टी में तब्दील करना शुरू कर दिया था व तमाम बड़े नेताओं के रूप में बनियो की भरमार हो गई।

इनमें खुद केजरीवाल, पंकज गुप्ता से लेकर आशीष खेतान, आशुतोष तक शामिल थे। मगर जब उन्होंने अपनी पार्टी के दो राज्यसभा पदो पर बनियो को भेजा तब मुझे पूरा विश्वास हो गया कि वे भी पूरी तरह से ठग्गू के लड्डू ही हैं। मुझे सबसे अच्छा तो तब लगा जबकि राज्यसभा पद के लिए लार टपकाते, पत्रकारिता छोड़कर आप मे आए पत्रकार आशुतोश को उन्होंने ठेंगा दिखा दिया। आशुतोष तो अवसरवादिता का पर्याय है। वे नेताओं के बीच में पत्रकार व पत्रकारों के बीच में नेता बन जाते थे। 

अरविंद केजरीवाल ने उन्हें राज्यसभा में न भेज कर उन्हें उनकी औकात बता दी व आप के प्रवक्ता बने आशुतोष अब पुनः पत्रकार बन गए हैं। हालांकि उनकी विश्वसनीयता के बारे में पाठक ही कुछ कहें तो बेहतर होगा। खुद को बहुत बड़ा बुद्धिजीवी मानने वाले आशुतोष ने जब चांदनी चौक से चुनाव लड़ा था तो एक अंग्रेजी के अखबार ने यह खुलासा किया था कि वे जाति से बनिए है। बनिया बाहुल्य इस चुनाव क्षेत्र में लोगों का यह तथ्य जानना जरूरी था। मगर बनिया मतदाता ने उन्हें नहीं अपनाया। 

अब हाल ही में यह काम पार्टी की नेता व प्रवक्ता आतिशी मर्लीनी ने किया है। कुछ समय पहले किसी कांग्रेसी नेता ने उन पर यहूदी होने का आरोप चस्पा कर दिया था। बस क्या था। आतिशी मर्लीनी ने तुरंत सफाई देते हुए कहा कि वे यहूदी नहीं बल्कि राजपूत पंजाबी है। उनका असली नाम आतिशी मरलेना है जिससे उन्होंने मरलेना हटा दिया। उन्होंने सफाई दी कि उनके पिता का नाम विजय सिंह व पति का नाम प्रवीण सिंह है। मां-बाप के वामपंथी होने के कारण मैंने नाम बदला था।

आतिशी मर्लीनी पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट से आप पार्टी की उम्मीदवार है उनका भाजपा के गौतम गंभीर व कांग्रेस के अरविंदर सिंह लवली से मुकाबला है। कांग्रेस द्वारा उनके धर्म पर सवाल उठाए जाने के बाद उन्होंने कहा कि वे तो पंजाबी हिंदू परिवार से तालुक रखती है। आप पर जाति और धर्म की राजनीति न करने का दावा करते हुए उन्होंने सफाई दी कि वे तो पंजाबी हिंदू परिवार की क्षत्रिय है। क्या कांग्रेस अध्यक्ष उन्हें यहूदी कहने के लिए क्षमा मांगेंगे? उनका नाम कार्ल मार्क्स व ब्लादीमोर लेनिन के नाम को लेकर बनाया गया था जोकि सुनने में ईसाई नाम लगता था। इसलिए उन्होंने पिछले साल अपने नाम से मरलेना हटा दिया था। वे तो आतिशी सिंह है। 

ध्यान रहे कि पिछली बार पूर्वी दिल्ली से महेश गिरी चुनाव जीते थे। जिनका टिकट भाजपा ने इस बार काट दिया और जाने-माने खिलाड़ी गौतम गंभीर को अपना उम्मीदवार बनाया। यहां 20.31 लाख मतदाता है। इनमें मुसलमान मतदाता काफी बड़ी संख्या में है। भाजपाई तो खुराफात करने में माहिर है। वैसे इन मामलो में कांग्रेस भी कम नहीं है। खुद को यहूदी बताए जाने से आतिशी को आग लग गई क्योंकि उनके इलाके में एक भी यहूदी मतदाता नहीं है। ध्यान रहे कि मुसलमानों व यहूदियों का झगड़ा बहुत पुराना है व ईजरायल बनने के बाद फिलिस्तीन पर कब्जे को लेकर दोनों के बीच खूनी संघर्ष होता आया है व आज भी ईजरायल व अरब राष्ट्र एक दूसरे के दुश्मन है। 

आतिशी मर्लीनी को लगा होगा कि उन्हें यहूदी करार दिए जाने से बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता उनसे कट जाएंगे। अतः वे बिदक पड़ी और उन्होंने यह सफाई दी कि वे यहूदी नहीं है। ध्यान रहे कि सुरक्षा के मामले में भारत व अजरायल में काफी गहरे व अच्छे संबंध है मगर यहां तो मामला चुनाव व वोटो का है। एक बार राजनीति ने उन्हें नाम बदलने के लिए मजबूर किया तो दोबारा उसने चुनावी राजनीति ने उन्हें अपनी जाति व धर्म बनाने के लिए मजबूर कर दिया।

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