ऐसे फैसले से बनता है भरोसा


[EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 08 May, 2019 08:33 AM | Total Read Count 99
ऐसे फैसले से बनता है भरोसा

आमतौर पर अगर हमें पुलिस वाले की गलती से भी कोई ड्राइविंग चालान मिल जाएं तो हम लोग उसे अदालत में चुनौती देने के बजाए चालान के रुपए भर कर उससे छुटकारा पाने का तरीका ढूंढते हैं। हालांकि जिस तरह से हाल में आम चुनाव के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बलात्कार की शिकार हुई दहोद जिले की रहने वाली एक गरीब व अनपढ़ महिला के बारे में अपना जो फैसला सुनाया है वह देश के लिए चौंकाने वाला है। 

उससे यह साबित हुआ है कि न्याय मिलने में देर तो होती है मगर वह गरीब और अनपढ़ इंसान को भी मिल ही जाता है। उसका सामना पढ़े लिखे सशक्त शासन से था जिसके पास सारी ताकत थी। जब 3 मार्च 2002 को गुजरात में साबरमती एक्सप्रेस पर हमला कर 59 कार सेवकों को जलाकर मर डाला गया तो गुजरात में हिंसक सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। हिंसक भीड़ निर्दोष मुसलमानों को अपना निशाना बनाने लगी। उस समय बिलकीस बानो अपने परिवार के 17 सदस्यो के साथ एक ट्रक में चढ़कर जान बचाने के लिए घर से भागी। 

रास्ते में भीड़ ने ट्रक को घेर लिया व पांच माह की गर्भवती बिलकीस बानो गैंग रेप की शिकार बनी जबकि परिवार के 14 सदस्यों की हत्या कर दी गई। जिनमें उसकी दो साल की बेटी, मां व चचेरा भाई शमीम भी शामिल थे। जब उसे तीन घंटे बाद होश आया तो उसने पाया कि वह लाशों के ढेर के बीच पड़ी है। वह वहां से भागकर पास की पहाडि़यो में पहुंची और उसने एक आदिवासी परिवार के घर में अपनी शरण लेकर जान बचाई। 

उसका मुकदमा 14 साल तक चला और अपने घर पर न रहकर इधर-उधर छुपते-छिपाते रहते हुए वह अपना मुकदमा लड़ती रही। दो साल पहले मई 2017 में मुंबई हाईकोर्ट ने इस मामले में 12 लोगों को दोषी ठहराते हुए उसे 5 लाख रुपए का मुआवजा देने का ऐलान किया। मगर उसने इसे नहीं स्वीकारा और ज्यादा मुआवजे व सजा की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी और भारत के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायाधीश दीपक गुप्ता व संजीव खन्ना की खंडपीठ ने गुजरात सरकार को उसे 50 लाख रुपए का मुआवजा देने के साथ ही सरकारी नौकरी व मनपसंद की जगह घर देने का फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर राज्य सरकार ने यह सब पहले ही दे दिया होता तो यह नौबत नहीं आती। 

अदालत ने राज्य सरकार के कुछ अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई को पर्याप्त बताते हुए सरकार से कहा कि आप सौभाग्यशाली है कि हम आपके खिलाफ कुछ नहीं कर रहे हैं।

इस फैसले के अगले दिन दिल्ली के प्रेस क्लब में बिलकीस बानो ने प्रेस कांफ्रेंस की और गुजराती में कहा कि वह मुआवजे के रूप में मिलने वाली 50 लाख रुपए की राशि का उपयोग बलात्कार व सांप्रदायिक हिंसा का शिकार होने वाली महिलाओं के पुर्नवास के लिए करेगी ताकि उनके बच्चे शिक्षित हो सके। उसने दंगों में मारी गई अपनी दो साल की बेटी सलेदा के नाम पर कोष की स्थाकपना की है। 

उसको इस बात का दुख था कि दंगों में मारी गई अपनी इस बेटी की उसे कभी लाश नहीं मिली और आज तक वह उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करती आई है। इस फैसले से मुझे थोड़ी बहुत राहत व शांति जरूर मिलेंगी। उसने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला बताता है कि वह अपनी जगह सही थी व उसने सही कदम उठाया था। मुझे देश की न्याय व्यवस्था व संविधान में विश्वास था व मुझे 17 साल से लगता रहा कि मुझे इंसाफ जरूर मिलेगा। 

जब उससे बलात्कार हुआ तो उस समय उसके पेट में 5 माह की गर्भ में उसकी बेटी हाजरा थी जोकि अब वकील बनना चाहती है ताकि वह भविष्य मे ऐसी महिलाओं की अदालत में मदद कर सके। इस अवधि में पहली बार बिलकीस बानो ने दाहोद जिले के देवगढ़ बरिया मतदान केंद्र पर मतदान किया। उसका कहना था कि इस फैसले के बाद वह राज्य के पास परिवार के साथ किसी एक स्थान पर शांति से जीवन बिता सकेगी। 

इस मौके पर जारी अपनी प्रेस रिलीज में उसने कहा कि पिछले 17 साल में मैंने अपने संविधान, अपनी न्यायपालिका व जमीर पर भरोसा किया। सम्मानीय सर्वोच्च न्यायालय ने मुझे बताया है कि वे मेरे साथ खड़े हैं। उन्होंने मेरे संवैधानिक अधिकारों को देने, मेरे दर्द, मेरी तकलीफ और मेरे संघर्ष को जो उस समय 2002 की हिंसा में मुझसे छीन लिया गया था, बहाल किया है। किसी भी नागरिक की राज्य के हाथों ऐसी तकलीफ नहीं झेलनी चाहिए जिसका फर्ज उसे सुरक्षा प्रदान करना होता है। एक पीडित के रूप में मैंने अपने सारे सपनों को मार दिया। मेरी जीत उन सब औरतो की तरफ से भी है जिन्होंने बहुत तकलीफे तो झेली मगर कभी अदालत तक नहीं पहुंच सकी। 

मैं व मेरे पति याकूब दंगों के दौरान मारी गई अपनी सबसे बड़ी बेटी सलेहा का दफन करने का फर्ज भी नहीं निभा पाए। मैं आज दुआ करती हूं कि उसके जैसी पीडि़त की रूह जिंदा बच गए लोगों की हिम्मत, आम नागरिको के संघर्ष और भारत के लोकतांत्रिक संस्थान, बार-बार मदद को आगे आएंगे और उस नफरत और डर को खत्म करेंगे जिसने हमारे देश को आज जकड़ा हुआ है। 

मैं सोच रहा था कि जब अक्षय कुमार का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लिया गया गैर-राजनीति इंटरव्यू प्रसारित होगा तो उसमें इस फैसले के बारे में जरूर सवाल होगा। मगर वे ही नहीं बल्कि नेताओं को गाली गलौच पर घंटों बहस करने वाले तमाम खबरिया चैनल भी चुप्पी साधे रहे। मेरी और से न्याय के लिए इतना लंबा संघर्ष करने वाली एक आम मुस्लिम महिला को सलाम।

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