मौन मतदाताओं से भोपाल का भी फैसला


[EDITED BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 13 May, 2019 07:32 AM | Total Read Count 131
मौन मतदाताओं से भोपाल का भी फैसला

भोपाल हमेशा से शांत शहर रहा है। लोग सौम्य हैं। लोग खुल कर अपनी बात कहने या राय जाहिर के बजाय चुपचाप देखना ही ज्यादा पसंद करते हैं। दूसरे हिंदी प्रदेशों जैसे राजस्थान, झारखंड, बिहार या उत्तर प्रदेश के मुकाबले भोपाल के लोग खुलकर अपने राजनीतिक विचार व्यक्त करना पसंद नहीं करते। लखनऊ, वाराणसी और भोपाल में यह बात समान रूप से दिखी कि जहां शौर है तो मौन भी मायने लिए हुए है। वोट शौर से पड़े है तो मौन लोगों ने भी उस शिद्दत में वोट डाला जिससे फैसला बनेगा। 

भोपाल में मौन मतदाताओं की लहर दिखी। मौन मतदाता दोनों उम्मीदवारों की खूबियों और खामियों को अच्छी तरह देख रहे हैं, उनका विश्लेषण कर रहे हैं, तौल रहे हैं। यानी वोट सोच-समझ कर ही पडा होगा नकि भावनाओं में बहकर या पार्टी निष्ठा से। 

भोपाल में 1989 से कांग्रेस एक बार भी नहीं जीती। लेकिन इस चुनाव का मौका ऐसा है जिसमें कांग्रेस या तो अपनी एक नई शुरुआत कर सकती है या फिर यह उसके लिए आखिरी मौका साबित होगा। ऐसे में दिग्विजय सिंह का इस चुनौती को स्वीकार करना ही बड़ी बात है। इस जुए में जीत कांग्रेस और दिग्विजय दोनों के लिए बड़ी उपलब्धि होगी। और अगर हार गए तो पहले ही खत्म हो चुके एक राजनीतिक जीवन का अंत हो जाएगा।

लेकिन लगता है, लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे और कई बार हाशिए पर डाल दिए और विवादास्पद बयानों से बखेड़ा खड़ा कर देने वाले दिग्विजय सिंह की वापसी हुई है और वे शीर्ष पर हैं। भोपाल की यह जंग दिग्विजय के लिए ज्यादा और साध्वी प्रज्ञा व नरेंद्र मोदी के लिए कम अहमियत वाली है। इक्कीस साल के राजनीतिक वनवास के बाद दिग्विजय सिंह आज कहीं ज्यादा प्रतिबद्ध और विश्वास से भरे हुए हैं और उनके हावभाव में यह स्पष्ट रूप से झलक भी रहा है।

बुधवार रात करीब साढ़े दस बजे दिग्वजय सिंह गोविंदपुरा इलाके में लोगों से मुलाकात कर रहे थे। इलाका बाबूलाल गौर के वक्त से ही भाजपा का गढ़ है। पिछले विधानसभा चुनाव में यहां से उनकी पुत्रवधू कृष्णा गौर छियालीस हजार से ज्यादा वोटों से जीती थीं और कांग्रेस उम्मीदवार गिरीश शर्मा को हराया था। पीपलानी बाजार में दो भाइयों- अजय और विजय की दुकान है। तीन पीढ़ी से कारोबार में लगे ये भाई बताते हैं- हमारे यहां न मोदी देखते हैं न साध्वी देखते हैं, हम सिर्फ कमल पर बटन दबाते हैं। इस इलाके में ऐसा ही मजबूत रुख देखने को मिलता है और दिग्वजय सिंह भी इसे बखूबी जानते हैं। फिर भी वे यहां समय लगा रहे हैं यह बड़ी बात हैं। बुधवार को उन्होंने पूरे इलाके में पदयात्रा की।

दिग्वजय सिंह पदयात्रा को ही ज्यादा तरजीह देते हैं। वे बड़ी रैलियों और सभाओं के बजाय लोगों से खुद मिलना पसंद करते हैं। पदयात्रा उनका प्रचार का परंपरागत तरीका है।कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भीड़ में वे चलते तो तेज हैं, लेकिन जो भी सामने आ जाता है उससे मिल लेते हैं। लोग उनके साथ चलते हुए सेल्फी लेते हैं। पदयात्रा में लोग उनसे हाथ मिलाते हैं और एकजुटता व समर्थन भी दिखाते हैं।

हालांकि बतौर मुख्यमंत्री दिग्वजिय सिंह का रिपोर्ट कार्ड अच्छा नहीं रहा, लेकिन लोगों से उनके निजी रिश्ते काफी अच्छे रहे हैं। राजनीतिक खुराफाती के रूप में मशहूर दिग्विजय सिंह अंदरखाने खेल करने, चुनावी प्रबंधन संभालने जैसे कामों में माहिर हैं, लेकिन लोगों के साथ उनका जो निजी जुड़ाव है उसका वजन इससे भी कहीं ज्यादा है और इसका दायरा हमेशा बढ़ा ही है। और दिग्विजय सिंह की यही खूबी प्रज्ञा ठाकुर पर भारी पड़ रही है जो भूले-भटके ही कहीं नजर आती हैं। दिग्विजय जहां सुबह आठ से लेकर देर रात तक लोगों से मिलते नजर आते हैं वहीं प्रज्ञा ठाकुर सब काम अपने हिसाब से कर रही हैं। नया इंडिया ने भोपाल में उनके अस्थायी निवास पर मिलने की कोशिश की तो बताया गया कि दीदी अभी आराम कर रही हैं। 

जब यह पूछा गया कि भोपाल जैसी महत्त्वपूर्ण सीट पर चुनाव हो और उम्मीदवार दिन में आराम कर रहा तो क्या माना जाए, इस पर उनकी टीम ने चिकित्सकीय कारणों का हवाला दे दिया। हकीकत है कि साध्वी प्रज्ञा को राजनीति के बारे में कुछ नहीं मालूम, न ही यह कि चुनाव कैसे लड़ा जाता है। वे भाषणों की जगह भजन-कीर्तन में लगी हैं। वे महिलाओं के बीच अपनी पीड़ा को बताकर उसे भुनाने से ज्यादा कुछ नहीं करतीं। विकास की बात उनके संवाद में कहीं नहीं होती।

लेकिन इन सबसे फर्क कुछ नहीं पड़ने वाला। गोविंदपुरा में रहने वाले तीस साल के रमेश कहते हैं कि वे भाजपा के बजाय नोटा बटन दबाना ज्यादा पसंद करेंगे। रमेश ने कहा- इससे ज्यादा शर्मनाक कुछ नहीं होगा कि संसद में भोपाल का प्रतिनिधित्व एक आरोपी आतंकी करे। और ऐसा कहने-सोचने वाले अकेले रमेश ही नहीं हैं। मोदी के नाम पर एक बार वोट दे देने वाले पच्चीस से तीस साल के बीच के युवाओं की बड़ी तादाद है जो ऐसा सोच रही है। यही मौन वर्ग इस बार निर्णायक होगा। नौजवानों का मानना है कि साध्वी प्रज्ञा को चुनाव मैदान में उतारना बहुत ही शर्मनाक और हास्यास्पद है और इसलिए भोपाल में मोदी का गुब्बारा फूट सकता है।

निसंदेह साध्वी की अलोकप्रियता भाजपा की जीत में बड़ी बाधा है। जो उत्साह और जोश दिन-रात दिग्विजय सिंह के कार्यकर्ताओं में नजर आ रहा है वहीं भाजपा में स्थिति ठीक उलट है। भाजपा कार्यकर्ताओं ने काम करना तो मतदान से पहले ही एक तरह से बंद कर  दिया, उनकी उम्मीदें भी खत्म हो गई हैं और अब वे संघ व राम भरोसे बैठ गए हैं।

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