घायल हम हैं या पाकिस्तान?


[EDITED BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 05 March, 2019 08:39 AM | Total Read Count 317
घायल हम हैं या पाकिस्तान?

बहुत अटपटा और घटनाक्रम की मजाकिया ट्रैव़्इस्टि, पैरोड़ी है जो आंतकी देश शांति का कबूतर उड़ाता हुआ माना जा रहा है और आंतक में घायल देश दुनिया से नसीहत सुनता हुआ कि मत बनों जंगखोर!  भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के सत्तर साल के इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब सुनाई दिया हो कि पाकिस्तान का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री अमनपरस्त हैं! वह बातचीत की बार-बार पेशकश कर रहा है लेकिन भारत जंग के उन्माद में है। भले मखौल वाली बात है लेकिन पाकिस्तान की संसद में इमरान खान को अमन के लिए नोबेल शांति पुरस्कार का प्रस्ताव बनना सर्वाधिक अटपटी बात है।  भारत-पाकिस्तान रिश्तों के प्रतिनिधी चेहरे में नरेंद्र मोदी और इमरान खान कई जगह ऐसे चर्चित है मानों पाकिस्तान में गांधी की आत्मा ट्रांसफर हो गई है और भारत में जिन्ना की। पाकिस्तान की जंगखोर, आंतक निर्यातक देश की बदनामी पुरानी है जबकि भारत के समझदार, अमनपरस्त, जिम्मेवार एटमी महाशक्ति होने की इमेज उसके कंट्रास्ट में रही है। बावजूद इसके आज के बदले वैश्विक नजरिए की बानगी में  वैश्विक प्रतिष्ठा वाली लंदन की ‘द इकॉनोमिस्ट’ पत्रिका के संपादकीय की इस लाईन पर जरा गौर करें– प्रधानमंत्री मोदी के पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रूख का एक और अकेला मकसद आगामी लोकसभा चुनाव को जीतना है जो अब से पहले उनके लिए मुश्किल माना जा रहा था।‘

क्या इस एक वाक्य को वैश्विक नेताओं और कूटनैतिक जमात में भारत के प्रधानमंत्री और उसके कारण आंतक में घायल भारत के प्रति नजरिये में अस्थाई परिवर्तन का प्रमाण नहीं माना जाए?  जैसे हम अलग भाव में बह रहे है वैसे दुनिया में भारत और पाकिस्तान पर आज अलग तरह से विचार है। रिश्तों की इस पैरोडी, ट्रैव़्इस्टि के बीच एक और गंभीर पहलू भारत में लोगों के मूड का है। भारत में जोश का है। पुलवामा से पहले देश का मूड चुनावी हल्ले में खोया हुआ था। लेकिन पुलवामा में आतंकी हमले के बाद बार-बार मूड बदला और उसकी बहस में अलग-अलग राय बनी है। जहां भावनाओं का, उग्र राष्ट्रवाद का सैलाब तेजी से उठा, उमड़ा तो अभिनंदन की पाकिस्तान में हिरासत और रिहाई के बीच सदमें, निराशा और जोश के मिले-जुले रूप में वे अनुभव हुए जिससे द्विपक्षीय रिश्तों में सोच बदली है तो एप्रोच को ले कर भी बहस है।  

पहली बार यह भी हुआ कि दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों में अमेरिका और सऊदी अरब आदि का रोल दिखा। भारत ने इस्लामी देशों के संगठन से अचानक बहुत उम्मीद पाली। मगर दो दिन बाद जब कश्मीर पर इस्लामी संगठन ने तीखी आलोचना की तो फिर मूड बदला। जाहिर है पंद्रह दिनों की घटनाओं में भारतीय जनमानस में जोश, उग्र राष्ट्रवाद और निराशा का मिला-जुला रूप ठीक यो-यो खेल जैसा रहा तो उसी अनुसार भारत-पाक के रिश्तों की गुत्थियों में नए मोड़ है।  

पुलवामा में आतंकी हमला हुआ तो देश में बदले की, पाकिस्तान को मुहंतोड़ जवाब देने की मांग की। फिर हमें 26 फरवरी को सर्जिकल स्ट्राइक-2 की खबर मिली। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनवा प्रांत के बालाकोट कस्बे में जैश ए मोहम्मद के ठिकानों पर भारतीय वायुसेना ने बड़े हमले, एक हजार किलो के बम बरसाने और साढ़े तीन सौ जेहादियों को मार देने की खबर से पूरा देश जश्न में डूब गया। 

सचमुच उस दिन लोगों में गजब का जोश था, मनोबल ऊंचा, चारों तरफ खुशी की सुनामी थी। सत्तारूढ़ दल के कई नेता सड़कों पर लोगों के साथ जश्न मनाते और मिठाई खाते-खिलाते देखे गए। लोग ढोल-नगाड़ों के साथ नाच रहे थे और पटाखों का शौर बता रहा था कि दीवाली तो आज मनी है। खुशी का आलम यह था कि रेस्टोरेंटों से ऐसे ऑफर थे जैसे मुफ्त में खाना मिल रहा हो, ऑटो वाला मुफ्त में चलने को तैयार था और शाम होते-होते सब जगह बाजार जैसे लाइटों की रोशनी में नहाने लगे। चैनलों के न्यूजरूमों की हालत तो यह थी कि जैसे असली लड़ाई वही लड़ रहे हों, विमानों से बमबारी के दृश्यों को खूब बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया। इसमें कोई शक नहीं कि देश का मूड पूरे उफान पर था। 

लेकिन वह खुशी ज्यादा देर तक नहीं रही। रंग में भंग तब पड़ा जब पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता ने भारत पर उसकी वायु सेना के हमले की खबर दी। भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान को मार गिराने और पायलट की गिरफ्तारी की खबर से देश सन्न हो गयाय़  27 फरवरी का वह दिन भारत के लिए किसी काले-दिन से कम नहीं था। दोनों देशों के बीच तनाव इतना ज्यादा बढ़ गया था कि शायद ही किसी ने दो एटमी ताकत वाले देशों के ऐसे विकट तनाव क कल्पना की हो। सोशल मीडिया पर हैशटैगसेनोटूवार  तेजी से चल रहा था। सारे दिन लोग टीवी के सामने और मोबाईल लेकर बैठे रहे ताकि विंग कमांडर अभिनंदन को लेकर ताजा खबर मालूम हो। अभिनंदन की सुरक्षित वापसी के लिए हर कोई प्रार्थना कर रहा था। 27 फरवरी की रात नींद उडाए हुए  थी। 

सब कुछ अनिश्चित  और आशंकाओं में सोशल मीडिया से लेकर चैनलों तक भावनाओं का ज्वार पैंदा पा चुका था और एक ही सवाल पूछा जा रहा था- क्या युद्ध होगा?  मगर दिन में इमरान खान के भाषण और अगले दिन संसद में अभिनंदन की रिहाई की घोषणा कर  हैशटैगसेनोटूवार से हैशटैगसेयसटूवार वाली बाते इस कयास में बदली की इमरान खान कैसे ऐसे अमन के मसीहा हो गए है। उन्होने जंग के भभके के बीच कैसे अमन का कबूतर उड़ा दिया? 

और जितने मुंह उतनी बातें लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रेस कांफ्रेस ने आखिरकार मैसेज बना दिया कि जब अमेरिका सहित कई देश दोनों देशों के तनाव के पंच बन गए है तो जंग तो होने से रही। और अब यक्ष प्रश्न है कि इस सबके बीच आंतक के मसले का क्या हुआ? आंतक से घायल भारत की मरहम पट्टी का कहां से, कैसा क्या वायदा हुआ है जिससे माना जाए कि दोनों देशों के रिश्तों में खून खराबा कुछ दिनों, महिनों या सालों स्थगित रहेगा।   

समस्या कोई हो, भले आतंक की हो तब भी दो देशों के बीच युद्ध समाधान नहीं हो सकता। लॉरेंस डी फ्रीडमैन ने अपने निबंध - युद्ध से कभी भी युद्ध खत्म नहीं हुए हैं – में लिखा है कि 1914 के विश्व युद्ध का सबक यह है कि कोई निश्चित सबक नहीं हैं! युद्ध कोई विश्वसनीय समाधान नहीं है, क्योंकि इससे सिर्फ संदर्भ भर बदलते हैं।‘ ऐसा है भी। जब ऐसे माहौल में हमारी भावनाएं अच्छी होती हैं तो युद्ध  महज विकल्प के रूप में दिखने लगता है। लेकिन जब हालात बिगड़ते चले जाते हैं तो युद्ध अपरिहार्य सा लगने लगता है। फिर इसका विकल्प नहीं दिखता। 

भारत और पाकिस्तान में तीन बार युद्ध हो चुके हैं। सीमाओं पर हमारी सेना लगातार सैन्य लड़ाइयों में उलझी रही है। लेकिन हमें इन युद्धों और सीमा पर होते रहे टकरावों से मिला क्या? और ज्यादा आतंकी हमले हुए, ज्यादा जानें गईं। कई बार दोनों देशों ने हर तरह से हर स्तर की वार्ता भी की, जिसमें द्विपक्षीय, बहुपक्षीय वार्ताएं थीं, कूटनीतिक प्रयास थे, शिखर वार्ताएं भी हुईं। इनमें भारत ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और आतंकी हमलों के ठोस और अकाट्य प्रमाण भी पेश किए। लेकिन पाकिस्तान की ओर से आज तक एक भी ऐसा संकेत नहीं मिला जो यह दिखाता हो कि वह अपने यहां आतंकी तंत्र को नष्ट करने के लिए कोई प्रयास कर रहा है। 

तब समाधान कहां? 
हिसाब से पाकिस्तान को उत्तर कोरिया की तरह ही अलग-थलग कर देना चाहिए। लेकिन ऐसा हो नहीं सकता। पाकिस्तान बुनियादी रूप से एक अस्थिर और हिसंक देश है जिसके केंद्र में वैश्विक जेहाद का जहर भरा पड़ा है। पाकिस्तान आतंकवाद और आतंकियों को पालता-पोसता है। और परमाणु हथियारों से संपन्न होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए जरूरी  है कि उसके परमाणु हथियारों तक आतंकवादियों की पहुंच न बने। इसके लिए पाकिस्तान पर लगाम जरूरी है तो उससे नाता रखना भी जरूरी है। इसलिए अमेरिका के लिए भी उसे अछूत बनाना संभव नहीं है।  

सो यदि आतंक के मामले में पाकिस्तान को बांधना है तो जरूरी है कि पाकिस्तान को आर्थिक युद्ध में उलझाया जाए। इस वक्त पाकिस्तान की माली हालत चरमराई हुई है। उसके पास बांध बनाने तक के पैसे नहीं हैं। सत्ता में आने के बाद एक टीवी प्रोग्राम में प्रधानमंत्री इमरान खान ने विदेश में रह रहे सभी पाकिस्तानियों से अपील की थी कि वे सरकार को एक-एक हजार डॉलर का दान दें, ताकि देश के लिए बड़ा बांध बनाया जा सके। सेना की मेहरबानी से सत्ता में आए इमरान खान की सरकार इस वक्त भुगतान संतुलन के गंभीर संकट का सामना कर रही है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के सामने हाथ फैलाने को मजबूर है। अगर यह मदद मिल जाती है तो ऐसा बाईसवीं बार होगा। पाकिस्तान के पास इस वक्त जो विदेशी मुद्रा भंडार है वह सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात की जमा राशि है और चीन का कर्ज। ऐसे में पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार कैसे बढ़े, इस्लामाबाद के सामने इसका गंभीर संकट है। 

ऐसे में भारत को चाहिए कि वह अंतरराष्ट्रीय मानदंडों और समर्थन के अनुरूप काम करे और ऐसे कदम उठाए जिनसे पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार नहीं बढ़ पाए और पाकिस्तान में होने वाला विदेशी निवेश रुके। आने वाले दिनों में भारत पेरिस में फाइनेंशियल टास्क एक्शन फोर्स (एफटीएएफ) के समक्ष पाकिस्तान को काली सूची में डालने के लिए गुहार लगाएगा। पिछले साल इस संस्था ने पाकिस्तान को निगरानी सूची में डाला था। जो देश आतंकवाद फैलाने के लिए आतंकवादी संगठनों को पैसा देते हैं उन पर यह संस्था कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाती है। ऐसे में पाकिस्तान के खिलाफ ठोस सबूत दे कर भारत उसे काली सूची में डलवा सकता है।  इस सूची में शामिल देश संदिग्ध श्रेणी में आ जाते हैं और उन्हें बाहर से मिलने वाली आर्थिक मदद बंद हो जाती है। 

पर भारत को देने होंगे ठोस सबूत? प्रधानमंत्री इमरान खान और उनके सत्ता प्रतिष्ठान को जंगखोर, आंतकियों को पोषण सप्रमाण साबित करना होगा। तभी जंग के उन्माद के ठंड़े पडने के बाद आज सवाल है कि इमरान खान ने विंग कमांडर की रिहाई और बार-बार बातचीत की पेशकश कर अपने को वैश्विक निगाहों में क्या बचा नही लिया है? तनाव खत्म कराने, विंग कमांडर की रिहाई के लिए जितने देशों ने बीच बचाव या पंच बनने का काम किया उन सबकी निगाहों में इमरान खान यह दलील बना बैठे है कि वे तो बातचीत के लिए तैयार है। आंतकी हमलों की जांच में सहयोग को तैयार है। तब कैसे उन्हे घेरा या पाकिस्तान को आर्थिक तौर पर प्रतिबंधित देश बनवाया जा सकता है।   

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