जात की बीमारी में राजस्थान में कयास


[EDITED BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 24 April, 2019 07:10 AM | Total Read Count 592
जात की बीमारी में राजस्थान में कयास

राजस्थान को जानना-समझना शुरू से आसान है। चुनाव के वक्त मुद्दे छाए रहते हैं। पानी का संकट, विकास, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच प्रदेश की पुरानी समस्याए हैं। कुछ सालों में बेरोजगारी और किसान आंदोलन भी बड़ी और गंभीर समस्या हैं। पिछले साल विधानसभा चुनाव में मतदाताओं का चुनावी मूड इन्हीं मुद्दों पर केंद्रित था। इसके अलावा वसुंधरा राजे को लेकर भी लोगों में गुस्सा था। लोग अपनी पसंद में अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बताते थे। जाहिर है यह पसंदगी निजी पसंद और आकर्षण की बदौलत थी।

लेकिन इस लोकसभा चुनाव में राजस्थान में जातिवाद ज्यादा ही सुनाई दिया। यों राजस्थान में कभी चुनावों में जाति का नैरेटिव छाया नहीं। हालांकि बाद में जातिवाद की बीमारी उत्तर प्रदेश और बिहार की तरह यहां भी फैलती गई। अब तो कहीं भी चले जाइए, किसी से भी बात करे, बातचीत जाति से ही शुरू होगी और खत्म भी उसी पर होगी। 

ऐसा इसलिए भी है कि टिकट बंटवारे के दौरान भाजपा और कांग्रेस ने जाति समीकरणों का पूरा ध्यान रखा है। तभी चुनाव में जातिवादी राजनीति का शोर है। लोग जाति को ध्यान में रख कर ही सब कुछ तय कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार से अलग, जहां जाति के घालमेल का ही दबदबा रहता है, राजस्थान फिर भी इस लिहाज से आसान है क्योंकि यहां जातिगत समीकरण ज्यादा है।

मोटे तौर पर राजस्थान में नवासी फीसद हिंदू, नौ फीसद मुसलमान और दो फीसद अन्य धर्मों के लोग हैं। इनमें अनुसूचित जाति की आबादी अठारह फीसद, अनुसूचित जनजाति की तेरह फीसद, जाटों की बारह फीसद, गुर्जरों और राजपूतों की नौ-नौ फीसद बताई जाती है। ब्राह्मण और मीणा समुदाय के लोग सात से दस फीसद के बीच बताते हैं।

राजपूत पारंपरिक रूप से भाजपा का वोट बैंक रहे हैं तो जाट कांग्रेस की तरफ। हालांकि इनमें बाद में बदलाव आते रहे हैं। 2014 के बाद राजपूत वसुंधरा राजे से नाराज हो गए थे और दूसरी ओर चले गए जैसे 2013 में अशोक गहलोत से जाट नाराज  होकर खिसक गए थे। इसके अलावा मानवेंद्र सिंह के कांग्रेस में शामिल होने के बाद राजपूत अब पुराना रूझान छोड़ते नजर आ रहे हैं।

चुनाव में भाजपा जाटों को अपनी ओर खींचने में लगी है। उसने नागौर से आरएलपी के हनुमान बेनीवाल को चुनाव मैदान में उतार कर जाटों का पत्ता खेला। इस अनुमान पर कि नागौर, जोधपुर, अजमेर और बाड़मेर जिलों के जाटों पर हनुमान बेनीवाल की पकड़ है।

उधर कांग्रेस ने छोटे जाति समूहों को अपने पक्ष में करने के लिए टोंक-सवाई माधोपुर और कोटा की सामान्य सीटों से नमो नारायण मीणा और राम नारायण मीणा को टिकट दिया है। कांग्रेस माली, गुर्जर, मीणा और कायमखानी जातियों के मिलेजुले वोट बैंक को एक करने में लगी है।

अशोक गहलोत सरकार ने गुर्जर समुदाय को विशेष वर्ग के तहत पांच फीसद आरक्षण देने का वादा किया था। सरकार की योजना थी कि अन्य पिछढ़ा वर्ग का आरक्षण 21 से बढ़ा कर 26 फीसद कर दिया जाए और इस पांच फीसद आरक्षण में गुर्जरों, राइका-रेबारी, गड़िया लोहार, बंजारा और गडरिया जातियों को आरक्षण दिया जाए। लेकिन गुर्जरों के नेता किरोड़ी सिंह बैंसला की भाजपा में वापसी से अब लग रहा है कि भाजपा को गुर्जरों के वोट मिलेगे। दौसा, करौली, अजमेर, भरतपुर, टोंक-सवाई माधोपुर और धौलपुर सहित लगभग दर्जन भर जिलों में गुर्जर समुदाय में बैंसला का प्रभाव है। इसके अलावा भाजपा गुर्जरों की कांग्रेस से नाराजगी को भी भुनाने में लगी है। सचिन पायलट को मुख्यमंत्री नहीं बनाए से गुर्जरों में कांग्रेस के प्रति नाराजगी बनी है।

लेकिन इस नाव की सवारी भाजपा के लिए आसान भी नहीं है। राजस्थान के कई शहरों में लोगों को यह कहते सुना जा सकता है कि ऐसे कई भाजपा नेता हैं जो जीतने में कोई मदद नहीं कर रहे हैं। जो निश्चित सीटें हैं, जो प्रतिष्ठा वाली सीटें हैं, उनमें भितरघात की राजनीति चल रही है।

इस तरह से देखें तो प्रदेश में जानकार तीन नतीजे संभव लगते हैं। पहला- भाजपा को बीस और कांग्रेस को पांच सीटे मिलेंगी। ऐसा उन लोगों का मानना है जो यह यह मान कर चल रहे हैं कि जाति की राजनीति के अलावा जोरदार मोदी लहर भी है।

दूसरी संभावना है कि भाजपा को अठारह और कांग्रेस को सात (सीकर, झूंझनू, टौंक सवाई माधोपुर, अलवर, श्रीगंगानगर, धौलपुर-करौली, बाडमेर) सीटें मिलें। ऐसा सोचने वाले वे है जिन्हें लग रहा है कि नरेंद्र मोदी पहली पसंद हैं, दूसरी अशोक गहलोत और इसके बाद जातिगत नेता।

तीसरी तरह के लोग वे है जो भाजपा की 13 और कांग्रेस की 12 सीटें सोचते है। ऐसा जो सोच रहे हैं उनके अनुसार मोदी को संदेह का कोई लाभ नहीं मिलने वाला और अशोक गहलोत की राजनीति कामयाब होगी। 

तीसरा नतीजा यह निकलता है कि जो हो, फिलहाल भाजपा मजबूत स्थिति में है। इसकी वजह है कि नरेंद्र मोदी चुंबक की तरह लोगों को अपनी ओर खींच पाने में कामयाब हैं। उनके भाषणों, बहादुरी और अपील लोगों को खींचने वाली हैं। हालांकि जाति की राजनीति चिंता का विषय हो सकती है। 

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