• [EDITED BY : Shruti Vyas] PUBLISH DATE: ; 11 March, 2019 06:18 AM | Total Read Count 466
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भारत में जीने की प्राणवायु मानों झूठ!

दस तरह की दस बाते। भारत और पाकिस्तान में तू-तू, मैं-मैं घट गई और भारत के भीतर तू-तू, मैं-मैं का यह चढता पारा कि फंला देशद्रोही है, फला झूठा है। हमारा हमला चेताने के लिए था तो जो सवाल कर रहा है उसकी देशभक्ति शक के दायरें में। सचमुच बालाकोट में भारतीय वायुसेना की कार्रवाई के बाद से देश में तरह-तरह की बातें चली और फैली। हर दिन के साथ यह रहस्य बढ़ता हुआ कि 26 फरवरी 2019 की देर रात आखिर हुआ क्या था। ‘हमले’ के बाद अगले दिन विदेश सचिव वीके गोखले ने कहा- ‘भारत की वायुसेना ने बालाकोट में जैश ए मोहम्मद के सबसे बड़े प्रशिक्षण शिविर पर हमले किए। इसमें जैश के कई आतंकी मारे गए। हमले में कोई भी नागरिक हतातह नहीं हुआ।’  बयान बहुत सावधानीपूर्वक तैयार किया गया। इतना अस्पष्ट कि इसने हरेक के मन में कई तरह के भ्रम पैदा किए। क्या अच्छा होता यदि इसके कुछ दिन गुजरने के बाद भारत सरकार खुद तस्वीरों के रूप में ही कुछ ऐसे सबूत पेश करती जिससे जनता के मन में एक भरोसा पैदा होता और लोग अपनी सेना की कामयाबी में झूमे रहते। लेकिन उलटा हुआ। ढोलबजाई शुरू हुई। इतने मार दिए। इतना ठोंक दिया। जैसे- ढाई सौ आतंकी मारे गए या यह कि वो झूठ बोल रहे हैं या यह कि ये सब देशद्रोही हैं..  आदि-आदि।

सो जैसे-जैसे भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम हुआ, वैसे-वैसे देश की जनता में भ्रम, तनाव व गुस्सा बढ़ने लगा। कौन झूठ बोल रहा है और कौन सच? झूठ-सच की कहानी किसने शुरू की, कैसे लगातार चली  यह सब एक रहस्य ही है। विपक्ष का कहना है कि सरकार ने इससे जुड़े हर मुद्दे का शुरू से राजनीतिकरण कर डाला। दूसरी ओर सरकार कह रही है कि विपक्ष पाकिस्तान की कठपुतली बन गया लगता है।  देशद्रोही है, जो सेना की क्षमताओं पर सवाल उठा रहा है। मीडिया का भी बड़ा हिस्सा टीआरपी की होड़ में ऐसा लगा कि उसने तथ्यों को दिखाने की जरूरत नहीं समझी और कुछ थोड़े से लोग जो तथ्य और सच दिखाने की कोशिश में लगे थे उनकी खबरों को ‘फेक न्यूज’ बताया जाने लगा। ऐसे में आम आदमी झूठ, धोखे और संदेह के भंवर में डुबता फंसता गया।

दरअसल कुछ समय से भारत झूठ के जाल में लगातार गहरा फंसा हुआ है। शुरुआत मोदी की ‘उम्मीद’ से हुई थी, जिसे नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनाव प्रचार में देश की जनता के सामने पेश किया था। आर्थिकी की कायापलट के दावे वाले कदम, नोटबंदी, भ्रष्टाचार से लड़ने की मुहिम का शोर के बीच में ‘उम्मीद’ उनके ’अच्छे दिन’ के जुमले और सपने के साथ झूठ लगातार नैरेटिव का एक पक्ष बनता गया। और राफेल सौदा मोड साबित हुआ। ऐसा मोड जिसमें अंबानी को फायदा  हुआ देखा जा रहा है तो उसे राष्ट्रीय सुरक्षा की दिशा में बड़ा हुआ कदम भी बताया जा रहा है। इस सबके बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद ही ऐसा शोर बनाया है जिसमें सच और झूठ को अलग कर पाना नामुमकिन ही है। 

राजनीतिकों का झूठ बोलना नई बात नहीं है। अगर इतिहास पर नजर डालें तो सत्ता हासिल करने के लिए हर राजनीतिज्ञ ने झूठ को सबसे बड़ा हथियार बनाया है। हालांकि आज झूठ (लाइ) शब्द का अर्थ ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में बहुत ही खूबसूरत विशेषण के साथ बदल दिया गया है। इसे अब ‘पोस्ट ट्रुथ’  (बाद का सच) भी कहा जाने लगा है। 2016 में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के संपादकों ने ‘पोस्ट ट्रुथ’ को समझाते हुआ लिखा था- ‘ऐसे हालात या परिस्थितियों से संबंधित जिसमें जनमत बनाने में वास्तविक तथ्य कम प्रभावी होते हैं, बजाय भावनाओं और निजी मान्यताओं के।’ दूसरे शब्दों में झूठ।

आज ‘पोस्ट ट्रुथ’ में दुनिया में बहुत कायदे से चोरीछिपे और छलपूर्ण तरीके से झूठ बोला जा रहा है। आज झूठ, झूठ नहीं रह गया है, बल्कि वह एक ऐसा झूठ है जो सत्ता के बारे में भ्रम फैलाता है।

जरा एक बार फिर बालाकोट हमले पर विचार करते हैं। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रायटर ने जो फोटो और वीडियो जारी किए है वे बता रहे हैं कि बालाकोट में जहां भारतीय वायुसेना ने बम गिराए है, वहां किसी तरह की कोई तबाही नहीं हुई है, जैसा कि दावा किया जा रहा है। जबकि प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों में कहा है-‘जब हमने पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक की थी, तब क्या कोई चुनाव था? ... मैं सत्ता की चिंता नहीं करता। मुझे सिर्फ मेरे देश की सुरक्षा की चिंता है।’ उनके इस एक बयान से रायटर की खबरें और फोटो के जो प्रमाण बने हुए थे, उन्हे खूबसूरती से फर्जी बना दिया गया! इससे तो यही नतीजा निकलता है कि जो मौके पर, प्रंसगवश कहा जा रहा है, हकीकत या सबूत तो वही है।

कोई नहीं जानता कि कौन सच्चा है और कौन झूठा?  जो दिखाया जा रहा है और पढ़वाया जा रहा है उससे हकीकत का पता नहीं चलता। असलियत क्या है, कोई समझ नहीं सकता। मोदी के इस राज में अगर कोई सवाल उठाता है तो उसे देशद्रोही बना दिया जाता है और सवाल के सही जवाब की उम्मीद करना जबकि अपराध हो गया है।

दरअसल, इस तरह के झूठ और दुष्प्रचार का खेल सोशल मीडिय़ा के उदय के बाद शुरू हुआ है। खबरों के स्रोत इतने ज्यादा फैल गए हैं कि झूठ, अफवाह, दुष्प्रचार, फर्जी खबरें आदि फैलाना बहुत आसान हो गया है और इस काम में मिनट भर भी नहीं लगता। ऑनलाइन झूठ इस कदर तेजी से फैलता है कि एक दूसरा पिछले पर भरोसा करता चला जाता है, जबकि मुख्यधारा के मीडिया की खबरों पर उसे भरोसा नहीं होता। बालाकोट अभियान के दौरान इस्तेमाल हुए विमानों और मिसाइलों की इतनी तस्वीरें प्रचारित की जा चुकी हैं कि इनमें सच का पता लगाना अब बहुत ही मुश्किल काम है। प्रधानमंत्री लगातार इस बात का राग अलाप रहे हैं कि पिछले चालीस साल से पाकिस्तान को कोई मुंहतोड़ जवाब नहीं दिया गया था और उनके इस जवाब ने जनता को एक तरफ खड़ा कर दिया है। तभी द इकॉनोमिस्ट ने ठीक ही लिखा है- जब राजनीति कुश्ती की तरह बन जाती है तो इसकी कीमत समाज चुकाता है।

इसमें कोई शक नहीं कि ‘पोस्ट ट्रुथ’ के चलन ने एक तरह का खालीपन पैदा कर दिया है। ऐसा खालीपन जिसमें सच्चाई कहीं है ही नहीं और बौद्किता व विवेकपूर्ण तार्किक संवाद के लिए कोई जगह नहीं रह गई है। जब तक हमारे पास ऐसे तथ्य नहीं होंगे जिन पर आम सहमति बन सके तो ऐसे में सार्वजिनक संवाद का रास्ता बंद हो जाएगा। आज सिर्फ एकतरफा राजनीतिक भाषणबाजी रह गई है, जिसमें कुतर्क हावी है और तथ्यों की कोई अहमियत नहीं है। ऐसा माहौल पैदा किया जा रहा है जिस पर कोई भी भरोसा नहीं कर सकता है। हरेक दूसरे को संदेह की नजर से देख रहा है। चुनावी बिसात बिछ गई है जिसमें आगे और ज्यादा मजबूती और दृढ़ संकल्प के साथ झूठ बोला जाएगा, पाखंड रचा जाएगा और बेशर्मी की सीमाएं टूटेंगी। और ऐसा करने में नरेंद्र मोदी सबसे आगे होंगे। इसलिए हमें चौकन्ना रहना होगा, सारे सच सच नहीं हैं और सारे झूठ झूठ नहीं हैं।  

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