कांग्रेस में कसावट, जमावट और ‘कमलनाथ’


[EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 15 May, 2019 11:35 AM | Total Read Count 157
कांग्रेस में कसावट, जमावट और ‘कमलनाथ’

राकेश अग्निहोत्रीः कमलनाथ ने लोकसभा चुनाव परिणाम आने के 48 घंटे पहले अपने विधायकों, मंत्रिमंडल सहयोगियों के साथ लोकसभा का चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को भी भोपाल बुलाया है.. बड़ा मकसद  मतगणना के दौरान कोई जोखिम मोल ना लेते हुए नई जमावट और कसावट को ध्यान में रखते हुए फ्रंट फुट पर कांग्रेस की पोजीशन के साथ विरोधियों ही नहीं पार्टी के अंदर भी भविष्य की सियासत का संदेश देना ही होगा... विधानसभा चुनाव जीतकर कांग्रेस के नेता बने कमलनाथ मुख्यमंत्री के साथ अभी भी प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे हैं..

जिन्हें अच्छी तरह मालूम केंद्र में मोदी के जाने और उनके बने रहते मध्य प्रदेश की राजनीति में उन्हें अपनी सरकार को स्थिर रखने के लिए अतिरिक्त विधायकों का समर्थन जुटाना ही होगा.. प्रदेश कांग्रेस संगठन के मुखिया होने के नाते उनके सामने मिशन राहुल गांधी लोकसभा चुनाव को लेकर नई चुनौतियां से वह लगातार लड़ रहे वह बात और है कि सत्ता के मुखिया होने के नाते अतिरिक्त ताकत उन्हें पहले ही मिल चुकी है.. मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी स्वीकार्यता साबित कर कांग्रेस के अंदर की चुनौतियों से लगभग वो बाहर निकल चुके..

तो विरोधियों खासतौर से भाजपा के लिए इस चुनाव में उनका नेतृत्व, प्रबंधन क्षमता किसी चुनौती से कम साबित नहीं हो रही.. कई सीटों पर कांटे की लड़ाई के बीच हाईकमान की मध्यप्रदेश से इस चुनाव में अतिरिक्त एक दर्जन सीट की बढ़ती अपेक्षाएं हों या फिर बतौर मुख्यमंत्री जवाबदेही का एहसास समझा जा सकता है.. फिर भी सवाल खड़ा होना लाजमी है कि क्या कमलनाथ के लिए चुनौतियां सही में खत्म हो चुकी  या फिर लोकसभा चुनाव के परिणाम के साथ उन्हें सत्ता और संगठन के मोर्चे पर नई चुनौतियों से रूबरू होना ही होगा.. तो आखिर वो क्या वजह जो तलवार की धार पर चल रही मध्यप्रदेश सरकार की दिशा को प्रभावित कर सकती.. या फिर कमलनाथ और उनकी सरकार को दिल्ली की सल्तनत बने रहने और बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला..

  कमलनाथ जिन्होंने लंबे समय तक केंद्र की राजनीति करने के बाद मध्यप्रदेश को अपना स्थाई ठिकाना बना लिया.. जिन्हें पहले पहले प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष फिर विधायकों द्वारा कांग्रेस का नेता चुना गया..  मुख्यमंत्री की शपथ ली और मंत्रिमंडल विस्तार के बाद सरकार चलाते हुए अब विधानसभा का उप चुनाव लड़ रहे.. यानी मध्य प्रदेश को उन्होंने अपना स्थाई ठिकाना बना लिया है.. जिसका परिणाम लोकसभा चुनाव के साथ आएगा.. जिनकी जीत पर सवाल खड़े करना बेमानी होगा.. करीब 3 माह पहले  सांसद और राष्ट्रीय महासचिव रहते प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बनकर कमलनाथ ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कदमताल कर विधानसभा चुनाव में ज्यादा सीट हासिल कर भाजपा को सत्ता से बेदखल किया..

प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर कमलनाथ ने सिंधिया के अलावा दिग्विजय सिंह, सुरेश पचौरी, अजय सिंह, कांतिलाल भूरिया जैसे क्षत्रपों के साथ प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया को भरोसे में लेकर जो लड़ाई विधानसभा चुनाव में लड़ी.. वो लोकसभा चुनाव आते-आते बदल गई थी.. कारण विधानसभा चुनाव में कई दिग्गज नेताओं का हार जाना.. या फिर उनकी भूमिका बदल जाना और मध्य प्रदेश की सत्ता में दखल की हैसियत नहीं बनाए रखना हो.. जो विधानसभा का चुनाव हार गए इनमें से कई नेताओं को एक बार फिर लोकसभा में मौका दिया गया.. टिकट वितरण में भी कमलनाथ की खूब चली तो सबसे अनुभवी दिग्विजय सिंह को भी कठिन चुनौती के साथ भोपाल की सीट से उतार दिया गया.. मध्यप्रदेश में तीन चरण के चुनाव में जब उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में बंद हो चुकी है और अंतिम दौर के लिए मतदान की तारीख नजदीक आ रही..

तब अंतिम मतदान के 2 दिन बाद विधायकों, मंत्रियों और लोकसभा उम्मीदवारों की बैठक बुलाए जाने का कांग्रेस का एजेंडा सामने ला दिया.. दो चरण में होने वाली इस बैठक के महत्व को समझा जा सकता है.. क्योंकि विधायकों और मंत्रियों से वो लोकसभा चुनाव का फीडबैक खुद लेंगे.. जो पहले ही निजी एजेंसियों और प्रशासन के फीडबैक से अवगत हैं.. इस बैठक में विधायक मंत्री और लोकसभा के उम्मीदवार को अपने अपने क्षेत्र में मतगणना के दौरान सजग और सतर्क रहने की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है.. कमलनाथ ने मंत्रिमंडल का गठन भले ही दिग्विजय, ज्योतिरादित्य को भरोसे में लेकर किया हो..

लेकिन धीरे-धीरे हाईकमान का भरोसा जीत कर कैबिनेट पर अपना दबदबा साबित किया.. यही नहीं, मंत्रियों की उनके अपने क्षेत्र और उसके अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंप कर यह संदेश दे दिया था कि पार्टी के अंदर गुटबाजी जीत की राह में रोड़ा बनी तो मंत्रियों की खैर नहीं.. जिनके परफॉर्मेंस को लेकर सदन के अंदर और बाहर पहले भी सवाल खड़े होते रहे.. कई मंत्री यदि संगठन की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाए तो कई ऐसे भी हैं..

जिन पर कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और अपने रिश्तेदारों को महत्व देने का आरोप भी लगाया जा चुका है.. वह बात और है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ हमेशा 76 दिन में वचन पत्र के 83 वचन पूरे करने का दावा करते रहे.. बावजूद इसके किसान कर्ज माफी के मुद्दे पर मुख्यमंत्री को इस चुनाव में कई बार सफाई देना पड़ी.. जनअपेक्षाओं और मतदाताओं से अपना वादा निभाने को लेकर कमलनाथ की संजीदगी पर भले ही प्रश्नचिन्ह खड़ा नहीं किया जा सके.. लेकिन प्रशासनिक तौर पर कई फैसलों के समय रहते अंजाम तक नहीं पहुंच पाने ने सरकार की किरकिरी भी खूब कराई है..

ऐसे में विधायक दल की बैठक का एजेंडा फिलहाल भले ही लोकसभा चुनाव की संभावनाओं का आंकलन करना हो.. लेकिन चुनौती यहीं पर उनके सामने सबसे बड़ी खड़ी हो चुकी है.. पिछले विधानसभा चुनाव में 29 में से जिन 12 लोकसभा क्षेत्रों में कांग्रेस ने बढ़त बनाई थी उन सीट पर कांग्रेस हाईकमान जीत की गारंटी चाहता है.. जहां तक बात कमलनाथ की सत्ता और संगठन पर पकड़ मजबूत करने की.. तो कांग्रेस के अंदर उनकी स्वीकार्यता इस चुनाव में साबित हो चुकी है..

जब ज्योतिरादित्य से लेकर दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज अपने-अपने चुनाव क्षेत्र में फंसकर रह गए.. तब कमलनाथ ने ही राहुल और प्रियंका गांधी के मध्य प्रदेश की हर सीट पर माहौल बनाया.. सरकार में मजबूत पकड़ रखते हुए संगठन के प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते  कार्यकर्ताओं में भी  अपनी पैठ कमलनाथ बना चुके हैं.. यही कारण है कि कांग्रेस मध्यप्रदेश में भाजपा को कड़ी टक्कर देते हुए दिखाई दे रही.. तो भी चुनौती 8 से 12 लोकसभा सीट पर भाजपा का कमल नहीं खेलने देने की है..

निर्दलीय, सपा और बसपा के भरोसे अपनी सरकार का बहुमत साबित कर चुके.. कमलनाथ के लिए चुनौती चुनाव परिणाम सामने आने से पहले अतिरिक्त समर्थन को पुख्ता साबित करने की होगी.. तो देखना दिलचस्प होगा कि जो भाजपा कमलनाथ मध्यप्रदेश की सरकार गिरा देने का दावा करती रही.. उस भाजपा को संख्या बल के मोर्चे पर आगे भी कैसे फेल साबित करते.. चुनाव परिणाम के बाद परफॉर्मेंस के आधार पर मंत्रिमंडल से कुछ मंत्रियों की छुट्टी के साथ नए चेहरों को शामिल किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता..

तो देखना दिलचस्प होगा कि जिन विधायकों के प्रभाव वाले क्षेत्र में कांग्रेस का प्रदर्शन विधानसभा चुनाव के मुकाबले कमजोर साबित होता है.. वहां कमलनाथ के सामने विकल्प क्या होगा.. विधानसभा चुनाव में यदि 12 लोकसभा सीटों के आंकड़ों को कांग्रेस ने अपनी लोकप्रियता से जोड़कर पेश किया.. तो इस लोकसभा चुनाव में विधानसभा स्तर पर जीत और हार भी उनकी सरकार की मजबूती और कमजोरी का प्रतीक बन सकती है.. तो आंकलन इस बात का भी होगा कि आखिर कौन मंत्री और कौन विधायक सरकार में रहते भाजपा को मात नहीं दे पाया.. दूसरी महत्वपूर्ण बैठक लोकसभा उम्मीदवारों के साथ कमलनाथ की होना है..

जिसमें प्रत्याशी, कांग्रेस विधायक और संगठन के पदाधिकारियों की चुनाव में भूमिका को लेकर अपनी बात कह सकता है.. जिसके बाद मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका में कमलनाथ को सत्ता और संगठन की कमजोर कड़ियों को चिन्हित करना ही होगा.. लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया से लेकर दिग्विजय सिंह के साथ दूसरे कांग्रेस उम्मीदवारों की जीत प्रदेश कांग्रेस की दशा और दिशा को प्रभावित कर सकती है.. यदि राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी की कांग्रेस पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले चौगुनी और उससे ज्यादा सीट हासिल कर सके तो 23 को मध्य प्रदेश के सांसदों की भूमिका का आंकलन भी होगा..

तो कमलनाथ के लिए समय के साथ नई चुनौतियों से इनकार नहीं किया जा सकता.. जिन्हें बदलते राजनीतिक परिदृश्य में केंद्रीय राजनीति से लेकर प्रदेश की सियासत में चुनौतियों के साथ नई संभावनाओं का समय रहते करना होगा.. जिन्हें लोकसभा की करीब एक दर्जन सीट पर जीत एक नई ताकत दे सकती है तो अपेक्षाएं पूरी नहीं होने पर उनके नेतृत्व पर सवाल खड़े होने से भी इनकार नहीं किया जा सकता.. बड़ा सवाल केंद्र में बनने वाली सरकार में कॉन्ग्रेस की भूमिका यदि मजबूती के साथ निर्णायक साबित होती है तो भी क्या हर हाल में कमलनाथ की स्वीकार्यता और मजबूत होगी ...

क्योंकि बिना मध्य प्रदेश की सीटों में इजाफा के केंद्र की राजनीति में यह स्थिति संभव नहीं होगी ..और यदि कांग्रेस नई सरकार के गठन में अलग-थलग साबित होती  तो भी कमलनाथ की सियासी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला फिर भी सवाल क्या कांग्रेस के नाथ मध्यप्रदेश में अपनी मजबूती आगे भी साबित करते रहेंगे..

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