अवैज्ञानिक और तथ्यहीन दावें और भारत की छवि


[EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 16 May, 2019 07:50 AM | Total Read Count 101
अवैज्ञानिक और तथ्यहीन दावें और भारत की छवि

शकील अख्तर -- तेईस मई को चाहे जो परिणाम आएं इस चुनाव से भारत की इमेज बहुत खराब हुई है। हम दुनिया में मजाक काविषय बन गए है। पीछे जाना या प्रगति का रुक जाना अलग बात होती है। उसके कई कारणहो सकते हैं। मगर देश के सर्वोच्च पद से जब अवैज्ञानिक और तथ्यहीन बातेंकही जाती हैं तो दुनिया हंसती है। उसका बचाव नहीं किया जा सकता। पहले कभीविदेशी भारत को सांप और सपेंरों का देश बताकर हमारा मजाक उड़ाते थे। मगर आजादी केबाद अपनी मेहनत और कौशल से हमने खुद को साबित किया। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की एक आधुनिक छवि बनाई।आज दुनिया में भारत का सम्मान किस यहां के पढ़े लिखे प्रोफेशनलयुवाओं से है। जो दुनिया भर में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में उच्च पदोंपर काम कर रहे हैं। यहां के आईआईटी, आईआईएम और मेडिकल कालेजों से निकले स्टूडेंट विदेशों में हर जगह कुशल प्रोफेशनल के रूप में जाने जाते हैं।

लेकिन आज उनसे पूछा जाए तो आश्चर्य नहीं कि क्या बादलों में रेडार काम नहीं करते है?

क्या डिजीटल कैमरा जापान से पहले भारत में बन गया था? क्या 1988 में भारत में इंटरनेट था?आत्मविश्वास से लबालब भरे रहने वाले भारतीय युवा इन सवालों से बैकफुट परजा रहे हैं। वे क्या जवाब दें?  

एक तरफ तो कहाजा रहा था कि 2014 से पहले जब भारतीय विदेशों में जाते थे तो उनका कोईसम्मान नहीं होता था। उन्हें अपने भारतीय होने में शर्म आती थी।प्रधानमंत्री मोदी ने दावा किया कि हमने विदेशों में भारत का मान बढ़ायाऔर दूसरी तरफ खुद प्रधानमंत्री ने ही अकारण अवैज्ञानिक बातें की। टीवीएंकरों के प्रभाव में आकर खुद को कवि बताने में गौरव महसूस करें तो समझाजा सकता है लेकिन ईमेल, डिजिटल कैमरे, बादल-रैडार जैसी बात क्यों की? 

आज भारत में जवाहरलाल नेहरू को सबसे ज्यादा गालियां दी जा रही हैं। क्या इसलिए कि वे वास्तव में पढ़े लिखे थे? नेहरू से किसी की भी दस असहमितयां हो सकती हैंमगर उन्होंने भारत को एक आधुनिक देश बनाया इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता।विश्व में अगर भारत ने आई टी में अपना झंड़ा बुलंद किया तो उसका श्रेयनेहरू की दूरदर्शी नीतियों को ही जाता है जिन्होंने सत्तर साल पहले भारतमें आईआईटी की स्थापना की थी। उसी आईआईटी को छोटा करने के लिए मोदी जी नेकहा था कि हमें आईआईटी से ज्यादा आईटीआई की जरूरत है। दोनों बिल्कुल हीभिन्न चीजें हैं। जिनकी तुलना का कोई मतलब नहीं मगर सब मुझे ही मालूम हैमैने ही किया की व्याधि के चलते उच्च शिक्षा के मुकाबले सामान्य तकनीकीकौशल को खड़ा करने की असफल कोशिश हुई।

कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धु कहते हैं कि मोदी जी की बात सुनकर ऐसालगता है कि यह महान देश 2014 में ही जमीन से खोदकर निकाला गया है। उससेपहले कुछ था ही नहीं। नेहरू और कांग्रेस विरोध तो ठीक है। मगर 2014 सेपहले का सब कुछ अमान्य कर देने के चक्कर में खुद अपनी पार्टी के सबसॉ बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल की भी सारी उपलब्धियों पर भीपानी फेर देना कैसी राजनीति है? इससे कौन सा सुख हासिल होता है। दूसरोंको नीचा दिखाने का?  क्या इससे देश का सम्मान बढ़ता है? देश मजबूत होता है ?

आजादी से पहले जब ब्रिटिश संसद में भारत  की आजादी का प्रस्ताव रखा गयातो उस समय वहा विपक्ष के नेता चर्चिल ने क्या कहा था? उन्होंने यही कहा थाकि भारत की जनता अशिक्षित है। वह आजादी का मतलब ही नहीं समझेगी। उसेस्वतंत्र करने का कोई मतलब नहीं है। भारत के नेता स्थिति को नहीं संभालपाएंगे। नेताओं की सारी कोशिशें अपनी सत्ता बनाए रखने की होंगी। मगर क्याहुआ? नेहरू ने सबसे पहली बात ही साइंटिफिक टेंपर ( वैज्ञानिक मिजाज) कीकही। अफवाहों को देश का दुश्मन बताया। संस्थाओं को बनाया। देश कीविविधता को समझा और अनेकता में एकता का नया नारा दिया। भारत प्रगति के पथपर चल निकला। 

उनके बाद आने वाले हर प्रधानमंत्री ने जिनमें भाजपा के पहलेप्रधानमंत्री बने वाजपेयी जी भी थे इसी विकास की धारा को आगे बढ़ाया। मगरआज अचानक अहं ब्रह्मास्मि की गूंज सुनाई देने लगी। ऐसा आभास दिया जानेलगा कि पांच हजार साल की सभ्यता का यह देश जो कभी अपने ज्ञान और विज्ञानकी वजह से विश्व गुरू था अभी जन्मा है। उसके पास शक्ति और सम्मान कभी थाही नहीं। जो मिला वह मोदी जी के आने के बाद मिला?

क्या देश का सामूहिक विवेक इसे स्वीकार कर लेगा?  इसका जवाब तो 23 मई कोही आएगा। मगर उससे पहले दुनिया की प्रतिष्ठित मैगजिन टाइम ने जिस तरहहमारे प्रधानमंत्री मोदी के चित्र के साथ डिवाइडर इन चीफ का फ्रंट पेजबनाया उससे मोदी की नहीं भारत की छवि को धक्का लगा है। यह अन्तरराष्ट्रीयपत्रिका केवल पत्रकारिता में ही नहीं वैश्विक  कूटनीति में भी राय बनवाती  है।  दुनिया मेंकिसी देश की छवि बनाने और बिगाड़ने में इसका रोल होता है।

एक तरफ जब हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि अब दुनिया में भारत की बातबहुत गंभीरता से सुनी जा रही है तभी दुनिया का सबसे बड़ा प्रचार तंत्रकहता है कि मोदी भारत को विभाजन की खाईयों में बांटकर अपना राजनीतिकभाग्य चमकाने की कोशिश कर रहे हैं। टाइम का विश्लेषण 1947 से शुरू होताहै। जिसमें बताया गया है कि नेहरू ने किस तरह सबको साथ लेकर चलना शुरूकिया था। उसके बाद एक लंबा सफर चला मगर 2014 के बाद भारत की सरकार कीप्रवृति तानाशाही की तरफ जाने लगी। ऐसा नहीं है कि टाइम ने कांग्रेस कोबख्शा हो। चाहे दंगों की बात हो या विकास की कांग्रेस की तीखी आलोचना कीगई है। मगर एक तानाशाही तौर तरीके जिसमें खुद अपनी पार्टी को भी साथ मेंलेकर नहीं चलना दूसरे पहले से धर्म और जाति में बंटे देश को अपनेराजनीतिक लाभ के लिए उस तरफ और धकेलने के लिए मोदी को डिवाइडर इन चीफ कहागया है। विभाजन की खाइयों को पाटने के बदले और चौड़ा करना भारत के भविष्यके लिए सबसे खतरनाक प्रवृति बताई गई है।दुनिया में द्वेष, नफरत, अहंकार को कभी मान्यता नहीं मिली है। विश्व काइतिहास हो या साहित्य प्रेम, करुणा, मानवीयता के आधार पर सब विकसित हुआहै। खासतौर से भारत जैसेविविधतापूर्ण देश में अगर बांटने की प्रवृति ने यदि जड़े जमा ली तो आगे क्या होगा  किसी को नहीं मालूम। तभी टाइम पत्रिका के कवर हैडिंग का अर्थ सामान्य नहीं है। 

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