किसे चिंता है आर्थिकी की?


[EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 16 May, 2019 07:34 AM | Total Read Count 49
किसे चिंता है आर्थिकी की?

तन्मय कुमार -- देश की अर्थव्यवस्था बहुत बुरी दशा में है और जिस तेजी से यह ढलान की तरफ बढ़ रही है उससे मनमोहन सिंह का यह अंदेशा सही साबित होता लग रहा है कि देश आर्थिक मंदी की ओर बढ़ रहा है। यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रथिन रॉय ने भी कही है। उन्होंने कहा है कि देश गहरे आर्थिक संकट की दिशा में बढ़ रहा है। पर सवाल है कि इसकी चिंता कौन कर रहा है? क्या सरकार आर्थिक के गंभीर खतरे में जाने की खबरों पर ध्यान दे रही है और बचाव के उपाय कर रही है? ऐसा नहीं लग रहा है कि सरकार कुछ उपाय कर रही है। 

तभी ईरान के मंत्री भारत दौरे पर आए फिर भी सरकार ने ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध और तेल खरीद के मसले पर कोई बात नहीं की। भारत सरकार ने कहा कि नई सरकार इस बारे में विचार करेगी। ध्यान रहे दो मई से अमेरिकी प्रतिबंध लागू हो गया है और उसके मुताबिक भारत ने ईरान से तेल खरीदना स्थगित कर दिया है। आने वाले दिनों में इससे चौतरफा संकट होने वाला है। भारत में जब से चुनाव शुरू हुआ तब से कच्चे तेल की कीमत में सात फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है पर भारत में तेल चुनावी मजबूरी में सस्ता रखा गया है। 

चुनाव खत्म होते ही इसकी कीमत बढ़ेगी और फिर इसका असर महंगाई पर होगा। ध्यान रहे मुद्रास्फीति के जो ताजा आंकड़े आए हैं उनके मुताबिक खुदरा महंगाई दर बढ़ रही है। अगले महीने रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति की समीक्षा करने वाला है। अगर महंगाई का मौजूदा रुख कायम रहा तो केंद्रीय बैंक की नीतिगत दरें या तो स्थिर रहेंगी या बढ़ेंगी। 

देश की आर्थिक स्थिति कैसे बुरी दशा की ओर बढ़ रही है इसका अंदाजा कई और आंकड़ों से लग रहा है। पिछले दिनों औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े जारी किए गए। करीब दो दर्जन सेक्टरों में से आधे से ज्यादा की स्थिति खराब है। औद्योगिक उत्पादन की दर जीरो के करीब पहुंच गई है, जो पिछले साल इसी अवधि में पांच फीसदी से ऊपर थी। जाहिर है मांग घटने से औद्योगिक उत्पादन कम हो रहा है और इसके बावजूद महंगाई बढ़ रही है। मांग ज्यादा हो तो महंगाई बढ़ती है पर मांग कम हो और महंगाई बढ़ रही है तो यह ज्यादा चिंता की बात होती है। 

इसी तरह रुपए में गिरावट बदस्तूर जारी है और एक डॉलर की कीमत 70 रुपए से ऊपर चली गई। इसके बाद चुनाव खत्म होते ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी शुरू होगी, जिससे खुदरा और थोक दोनों महंगाई में इजाफा होगा। सो, 23 मई के बाद जो भी नई सरकार आएगी उसके लिए हालात संभालना मुश्किल होगा। अरसे बाद दोपहिया और चार पहिया वाहनों की बिक्री की दर घटी है। यह अपने आप में आर्थिक नरमी का संकेतक है। 

अब आर्थिकी की सेहत बताने वाले कुछ और आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति ज्यादा स्पष्ट होती है। सबसे बड़ा आंकड़ा सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का है। 2018-19 में जीडीपी की दर 6.98 फीसदी रहने का अनुमान है। यानी सात फीसदी से भी नीचे। सोचें सरकार ने जीडीपी की गणना करने का तरीका बदल दिया और खोखा कंपनियों को भी आकलन में शामिल कर लिया। सरकार ने आधार वर्ष भी बदल दिया फिर भी जीडीपी की दर सात फीसदी नहीं पहुंच पा रही है। 

औद्योगिक उत्पादन 0.1 फीसदी है तो 2018-19 में बिजली उत्पादन की दर करीब साढ़े तीन फीसदी की दर से बढ़ी है, जो पिछले पांच साल में सबसे कम है। इसी तरह कारों की बिक्री में भी तीन फीसदी की दर से इजाफा हुआ है और यह भी पांच साल में सबसे कम दर है। चुनाव की वजह से सरकार ने पेट्रोल और डीजल सस्ता रखा है फिर भी पेट्रोलियम उत्पादों की खपत में उम्मीद के मुताबिक बढ़त नहीं हो पाई है। इस बार के चुनाव में विपक्ष ने रोजगार को मुद्दा बनाया है। इस मोर्चे पर भी ईपीएफओ का कहना है कि अक्टूबर 2018 से अब तक रोजगार सृजन के मामले में हर महीने औसतन 26 फीसदी की कमी आई है। 

नए वित्त वर्ष के पहले महीने यानी अप्रैल के पहले पखवाड़े में बैंक लोन में भारी गिरावट आई। करीब एक लाख करोड़ रुपए की कमी आने की खबर है। 

यानी औद्योगिक गतिविधियां ठप्प हो रही हैं, रोजगार नहीं बढ़ रहा है, लोन लेने में कमी आ रही है, गाड़ियों की बिक्री कम हो रही है और दूसरे कई आर्थिक संकेत भी इशारा कर रहे हैं कि हालात अच्छे नहीं हैं। पर हैरानी की बात है कि सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के नेता यह ढोल पीटने में लगे हैं कि भारत जल्दी ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने वाली है। 

भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी पर वह तो 135 करोड़ लोगों की उपभोग क्षमता के कारण होगा, इसमें सरकार की क्या भूमिका है? जहां सरकार को चीजों को ठीक करने का प्रयास करना चाहिए वहां वह हाथ पर हाथ धरे बैठी है। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका और चीन के बीच कारोबारी जंग छिड़ी है, जिसका असर भारत पर बहुत गहरा होने वाला है। तभी अगर जल्दी ही ठोस प्रयास नहीं शुरू किए गए तो नई सरकार के लिए बहुत मुश्किल होगी। 

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