सुरक्षा की बात और जाति पर वोट


[EDITED BY : Ajit Dwivedi] PUBLISH DATE: ; 29 April, 2019 07:15 AM | Total Read Count 532
सुरक्षा की बात और जाति पर वोट

भारत में चुनाव लड़ने और जीतने का कोई तय फार्मूला नहीं होता है। यह बात कई नेता मानते हैं कि जिस समय उनको लग रहा होता है कि उन्होंने बहुत काम किया है और वे जीत जाएंगे, उस समय वे हार जाते हैं और जब हारा हुआ मान रहे होते हैं तो जीत जाते हैं। जिस तरह भारत में सफल फिल्म बनाने का कोई फार्मूला नहीं है उसी तरह चुनाव जीतने का भी कोई फार्मूला नहीं है। तभी नेता कई फार्मूले आजमाते हैं। कई किस्म के वादे किए जाते हैं और कई तरह के समीकरण बनाए जाते हैं। यह मान कर कि कोई तो फार्मूला, कोई तो समीकरण कामयाब होगा!

पर भारत की राजनीति का एक फार्मूला ऐसा है, जो कभी नहीं बदलता, बल्कि समय के साथ उसकी महत्ता बढ़ती जा रही है। वह है जातिवाद का फार्मूला। जातिविहीन समाज की बात करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां भी इस फार्मूले को आजमाती हैं, देश की सबसे बड़ी और सबसे व्यापक सामाजिक आधार वाली कांग्रेस भी आजमाती है और राष्ट्र प्रथम का उद्घोष करने वाली भाजपा भी इसी फार्मूले पर चुनाव लड़ती हैं। बाकी तो जातियों पर आधारित पार्टियां है हीं, जिनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अकेले इस चुनाव में जाति पर आधारित कई नई पार्टियां चुनाव मैदान में हैं। पहले दक्षिण भारत में जाति पर आधारित पार्टियां बनती थीं। कम्मा की पार्टी टीडीपी तो कापू की पार्टी प्रजा राज्यम थी, वनियार की पार्टी पीएमके है तो दलित पार्टी वीसीके है। इसी तर्ज पर बिहार और उत्तर प्रदेश में यादव, कुर्मी, कोईरी, मल्लाह, मांझी, पासवान हर जाति की एक एक या दो दो पार्टियां बन गई हैं। दोनों राष्ट्रीय पार्टियां इन्हीं जातिवादी पार्टियों के भरोसे कई राज्यों में चुनाव लड़ रही हैं। 

राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, पाकिस्तान, सेना के शौर्य, सैनिकों को पराक्रम आदि के मुद्दों पर भाषण देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अंततः जाति के आधार पर वोट मांगने लगे हैं। हालांकि इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है। जिन लोगों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के प्रचार को बारीकी से देखा है उनको चुनाव के पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के उत्तरी हिस्से में पहुंचने का इंतजार था। पिछली बार भी मोदी ने इन इलाकों में प्रचार के दौरान ही अपनी पिछड़ी जाति का कार्ड चला था। उन्होंने उत्तर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही सबसे ज्यादा जाति का प्रचार किया था। अमेठी में प्रचार के दौरान ही प्रियंका गांधी ने मोदी के ऊपर नीची राजनीति करने का आरोप लगाया था, जिस पर मोदी ने कहना शुरू किया था कि उनकी नीची जाति को निशाना बना कर हमला किया जा रहा है। उससे पहले वे अच्छे दिन, गुजरात मॉडल और विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे थे। 

अब सवाल है कि आखिरी चरण चरण के मतदान से पहले प्रधानमंत्री मोदी को क्यों अपनी जाति की दुहाई देने की जरूरत पड़ी है, जबकि इस बार उन्होंने बहुत कायदे से राष्ट्रीय सुरक्षा का नैरेटिव बना दिया है? यह संयोग है, जो प्रचार शुरू होने से ठीक पहले पुलवामा में आतंकवादी हमला हो गया। थोड़े ही दिन के बाद सेना ने जवाबी कार्रवाई की और तबसे प्रधानमंत्री मोदी और पूरी भाजपा उसी मुद्दे पर वोट मांग रही है। इसी बीच श्रीलंका में भी आतंकवादी हमला हुआ और उस पर भी वोट मांगा जाने लगा। इसके बीच अचानक प्रधानमंत्री मोदी ने अपने को अति पिछड़ी जाति का नेता बता कर वोट मांगा है तो इसका मतलब है कि भाजपा का सेट किया हुआ नैरेटिव काम नहीं कर रह है। 

यह हकीकत है कि भाजपा का राष्ट्रीय सुरक्षा का नैरेटिव दक्षिण भारत में कारगर नहीं था। पूर्वोत्तर के इलाकों में भी ध्रुवीकरण के दूसरे मुद्दे थे पर राष्ट्रवाद का मुद्दा प्रभावी नहीं था। बचा प्रधानमंत्री मोदी का खुद का राज्य तो वहां उन्होंने अपने को गुज्जू और धरतीपुत्र बता कर वोट मांग लिया था। वहां उन्होंने अस्मिता की राजनीति की। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिन इलाकों में पहले तीन चरण में मतदान हुआ वहां भी पिछड़ी या अति पिछड़ी जाति का मामला ज्यादा नहीं था। इसलिए वहां सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयास हुआ। पर अब जिन इलाकों में चुनाव है वहां अति पिछड़ी जाति का कार्ड चलेगा। इसलिए मोदी ने बिल्कुल सही समय पर यह दांव चला है। 

असल में बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में आखिरी चार चरण में 94 सीटों पर मतदान है। इनमें से 85 के करीब सीटें भाजपा की हैं। इनको बचाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को जो एकमात्र दांव समझ में आया वह जाति का दांव था। तभी उन्होंने अपने को अति पिछड़ी जाति का बताया। यह भी कहा कि उनका जन्म तो ऐसी अति पिछड़ी जाति में हुआ, जिसके एकाध घर भी गांवों में नहीं होते थे। बहुत होशियारी से मोदी ने विपक्षी पार्टियों को जातिवादी ठहराते हुए यह बात कही पर असल मकसद अपनी जाति बताने का था। 

असल में जैसे ही चुनाव पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार की ओर बढ़ा भाजपा को लगने लगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और पाकिस्तान आदि का मुद्दा इन इलाकों में नहीं चलने वाला है। इन इलाकों में जाति की जड़ें बहुत गहरी हैं और जाति की राजनीति करने वाली पार्टियों की पकड़ भी बहुत मजबूत है। तभी राष्ट्रीय सुरक्षा को विकास की पहली शर्त बताते बताते प्रधानमंत्री मोदी अपनी जाति बताने लगे। पिछले चुनाव में इन इलाकों में मोदी की जाति का कार्ड चल गया था। पर वह पहली बार था। तब लोगों के अवचेतन में अच्छे दिन आने की और गुजरात मॉडल के तर्ज पर विकास होने की भी उम्मीद थी। पर अब न तो अच्छे दिन की बात है और न गुजरात मॉडल की। अब सिर्फ जाति, धर्म और राष्ट्रवाद की चर्चा है। ऐसे में जाति के बहुत कारगर होने की उम्मीद कम है।  

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