कमजोर होगी आतंकवाद से लड़ाई!


[EDITED BY : Ajit Dwivedi] PUBLISH DATE: ; 22 April, 2019 07:22 AM | Total Read Count 145
कमजोर होगी आतंकवाद से लड़ाई!

वैसे तो पार्टियां विरोधाभासों की राजनीति करती रहती हैं। अक्सर ऐसा होता है कि पार्टियां जो कह रही होती हैं, उसका बिल्कुल उलटा आचरण कर रही होती हैं। काले धन का विरोध करने वाली पार्टी काले धन से चुनाव लड़ती है। अपराध मिटाने का दावा करने वाली पार्टी अपराधियों को टिकट देती है। महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का वादा करने वाली पार्टियां दस फीसदी भी टिकट महिलाओं को नहीं देती हैं। जिस पार्टी को गाली देकर पार्टियां चुनाव लड़ती हैं, चुनाव के बाद उसी के साथ गठबंधन कर लेती हैं। इस दोहरे और विरोधाभासी राजनीति का चरम यह है कि आतंकवाद के नाम पर चुनाव लड़ रही पार्टी आतंकवाद की आरोपी को लोकसभा चुनाव का टिकट दे देती है। भाजपा ने यह मिसाल कायम की है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 मार्च को लोकसभा के लिए चुनाव अभियान की शुरुआत की थी। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मेरठ की अपनी पहली सभा से कहना शुरू किया कि उनकी सरकार ने आतंकवाद फैला रहे पड़ोसी मुल्क को सबक सिखा दिया है। वे खुद को दुश्मन के घर में घुस कर मारने वाला नेता बता रहे हैं और उस नाम पर वोट मांग रहे हैं। उन्होंने दावा किया है कि उनके राज में आतंकवादी हमले नहीं हुए। हालांकि उसी सांस में वे पुलवामा आतंकी हमले में मारे गए जवानों के नाम पर वोट भी मांगते हैं। यह भी अपने आप में कम हिम्मत का काम नहीं है कि कोई पार्टी, सरकार या नेता अपनी विफलता के नाम पर वोट मांगे!

बहरहाल, भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार विपक्षी पार्टियों को आतंकवादियों का सरपरस्त ठहराते रहे हैं। पर अंत क्या हुआ? भाजपा ने आतंकवाद की आरोपी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भोपाल लोकसभा सीट से उम्मीदवार बना दिया। भाजपा ने बहुत सोच समझ कर यह फैसला किया है। तभी प्रधानमंत्री खुद इस फैसले का बचाव कर रहे हैं। हो सकता है कि सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण कराने में इससे फायदा हो। सारे दांव चूक जाने के बाद भाजपा हिंदू-मुस्लिम की जिस राजनीति पर वोट लेना चाह रही है उसमें प्रज्ञा सिंह ठाकुर का चेहरा कारगर हो सकता है। पर क्या प्रज्ञा ठाकुर का चेहरा विकास पुरुष को चेहरे को विद्रूप नहीं बना देगा? क्या उनके लिए वोट मांगते समय प्रधानमंत्री विकास की बात कर पाएंगे? क्या वे भोपाल की चुनावी सभा में प्रज्ञा ठाकुर को बगल में खड़ा कर आतंकवाद से लड़ने का दावा कर पाएंगे? 

और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सनातन धर्म के नाम पर हिंसा करने वालों का चेहरा, हिंदू धर्म की महान परंपरा और सभ्यता को दागदार नहीं कर रहा है? हिंदू धर्म में कब अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने का भाव रहा है या हिंसा के सहारे दूसरे धर्म को खत्म करने की मिसाल कब रही है? सनातन धर्म और प्रज्ञा सिंह ठाकुर जैसों की सोच पर धार्मिक पहलू से बहस एक अलग विषय है। अगर सिर्फ राजनीतिक और कूटनीति के नजरिए से भी देखें तो ऐसा लग रहा है कि भाजपा ने सेल्फ गोल कर लिया है।  

भाजपा को यह समझना चाहिए कि दुनिया इस आधार पर आतंकवाद को परिभाषित नहीं करती है कि आरोपी के कपड़ों का रंग कैसा या उसके चेहरे पर धर्म को इंगित करने वाला कौन सा चिन्ह है। उसकी दाढ़ी है और उसने टोपी पहन रखी है या उसने टीका लगा रखा है और भगवा कपड़े पहने हैं, इससे आतंकवादी तय नहीं होता है। यह दुनिया के लिए सनातन बहस का विषय है कि आतंकवादी कौन है? किसी के लिए जो आतंकवादी होता है वह दूसरों के लिए आजादी या धर्म की लड़ाई लड़ने वाला योद्धा होता है। तभी भारत खुद संयुक्त राष्ट्र संघ में कहता रहा है कि वह आतंकवाद की एक सार्वभौमिक परिभाषा तय करे। 

सवाल है कि भाजपा की नजर में आतंकवाद की सार्वभौमिक परिभाषा क्या है? उस परिभाषा की कसौटी पर प्रज्ञा सिंह ठाकुर कहां खड़ी होती हैं? क्या अब संयुक्त राष्ट्र संघ में या किसी भी बहुपक्षीय मंच पर जब आतंकवाद को परिभाषित करने की बहस होगी और दुनिया का कोई देश एक ही सांस में हाफिज सईद और प्रज्ञा सिंह ठाकुर का नाम लेगा तो भारत क्या करेगा? क्या भारत वहां हमारा आतंकवादी बनाम तुम्हारा आतंकवादी की बहस में उलझेगा? 

प्रज्ञा सिंह ठाकुर के सहारे भाजपा ने यह जो नैरेटिव बनाने का प्रयास किया है कि हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता वह चुनावी रूप से कितना फायदेमंद होगा, इसका पता बाद में चलेगा पर राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से भारत के लिए बहुत नुकसानदेह होगा। यह भारत के सामाजिक ढांचे के लिए बहुत खराब होगा। इससे आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई कमजोर होगी ही साथ ही सामाजिक विभाजन और गहरा होगा। हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता, कहने वाले पड़ोसी देश श्रीलंका में दशकों तक चली एलटीटीई की लड़ाई को भूल जाते हैं। वे वेल्लुपिल्लई प्रभाकरण और उसके आतंकवादियों को याद नहीं रखते। 

हो सकता है कि तमिल अस्मिता में प्रभाकरण आजादी का योद्धा हो पर श्रीलंका के लिए आतंकवादी ही था। हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता, कहने वाले भूल जाते हैं कि इस उप महाद्वीप में पहली आत्मघाती आतंकवादी हिंदू महिला ही थी, जिसने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की थी। सारे आतंकवादी मुस्लिम होते हैं, यह नैरेटिव बनाने वाले भाजपा नेता भूल जाते हैं कि देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या एक सिख आतंकवादी ने की थी। यह समझ लेना चाहिए कि धर्म के आधार पर आतंकवाद को अच्छा या बुरा बताने वाले भाजपा के नेता भस्मासुर पैदा कर रहे हैं।

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