वाराणसी- मोदी की जीत का अंतर बढ़ेगा या घटेगा?


[EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 15 May, 2019 07:43 AM | Total Read Count 69
वाराणसी- मोदी की जीत का अंतर बढ़ेगा या घटेगा?

वाराणसी से नवेन्दु प्रकाश सिंह -- बाबा भोलेनाथ की काशी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर लोकसभा सीट बचाने के लिए मैदान में हैं। इस बार लड़ाई जीत-हार की नहीं, बल्किपिछली बार से बड़ी जीत दर्ज करने की है। दूसरी तरफ़ विपक्ष, खासकर कांग्रेस इस अंतर को कम कर मोदी के करिश्मे को धुंधलाने की लड़ाई लड़ रहा है। पहले प्रियंका गांधी के यहां से लड़ने की चर्चा थी। लेकिन अब दारोमदार पिछली बार जमानत जब्त करा चुके अजय राय के कंधों पर है। विश्वनाथ कारीडोर, मंदिरों को ढहाये जाने और गंगा में रीवर ट्रांसपोर्ट जैसी परियोजनाओं के विरोध और आम हिन्दू धर्मावलंबियों की नाराजगी को देखते हुए यह असंभव नहीं लगता है।

हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले काशी को मुक्ति (मोक्ष) का सबसे पवित्र, पौराणिक और आध्यात्मिक नगरी मानते हैं। हिन्दू धर्म में मान्यता है कि लोग मुक्ति के लिए काशी आते हैं। लेकिन अब मोदी जी कहते हैं कि उन्होंने काशी को मुक्त करा दिया है। उनका इशारा ‘काशी विश्वनाथ कारीडोर’ की तरफ होता है। काशी के सांसद के रुप में मोदी जी इसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताते हैं। लेकिन यही प्रोजेक्ट मोदी जी की काशी में रिकार्ड जीत पर ग्रहण भी लगा सकता है। काशी में इसका भारी विरोध हो रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद समेत तमाम हिन्दू धर्मावलंबी इसे बाबा भोले काशी की मौलिकता से छेड़छाड़ करार देते हैं। विरोध स्वरूप गंगा किनारे विश्वनाथ मंदिर क्षेत्र और पक्के महाल के आसपास की दुकानों पर लटकी तख्तियों से बखूबी समझा जा सकता है। भारी संख्या में लोग तख्तियों पर ‘कमल का फूल हमारी भूल’ लिखकर विरोध दर्ज करा रहे हैं। कुछ लोग तो इसकी तुलना औरंगजेब की दमनकारी नीति से भी करते हैं

मोदी जी काशी में विश्वनाथ मंदिर कारीडोर की जिस परियोजना को अपना ड्रीम प्रोजेक्ट बता रहे हैं उसे पूर्व पीएम इंदिरा गांधी ने 42 वर्ष पूर्व खारिज कर दिया था। यही नहीं इस प्रोजेक्ट के कारण यूपी के तब के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को इंदिरा गांधी का कोपभाजन भी बनना पड़ा था। इस बात का खुलासा पुपुल जयकर की पुस्तक ‘इंदिरा गाँधी, ए बायोग्राफी’ से हुआ है। इंदिरा गांधी की नजदीकी रहीं पुपुल जयकर को समाज सेवा के क्षेत्र में योगदान के लिए भारत सरकार द्वारासन 1967 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।बाबा भोलेनाथ की काशी से सांसद बनकर नरेंद्र मोदी भारी बहुमत से देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए थे। पर आज नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में उनके ड्रीम प्रोजेक्ट ‘काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर’ के तहत चल रहे ध्वस्तीकरण कार्य से काशी की जनता बुरी तरह आहत है।

मंदिर कॉरिडोर के लिए 182 भवनों को खरीदकर उनके ध्वस्तीकरण का कार्य इन दिनों वाराणसी में चल रहा है। इस ध्वस्तीकरण कार्रवाई के दौरान कई प्राचीन मंदिर अब एक-एक कर सामने आये हैं। इसमें 18 वीं से 19 वीं सदी के मध्य के अति प्राचीन मंदिर मिले हैं। ध्वस्तीकरण के दौरान एक ऐसा भी प्राचीन मंदिर मिला है जो विश्वनाथ मंदिर से हूबहू मिलता है। इन प्राचीन मंदिर की दीवारों पर कलात्मक आकृतियां खुदी हुई हैं जो यह दर्शाता है कि मुगल साम्राज्य के पतन के बाद प्रभावशाली हिंदूओं ने इस अवधि में बड़े पैमाने पर मंदिर निर्माण की अगुवाई की थी। पर अब मोदी इस महान विरासत को नष्ट कर रहे हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर क्षेत्र के भवनों के ध्वंस से एक बात अब साफ हो गयी है कि मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट "विश्वनाथ कॉरिडोर" के जरिए काशी की विरासत और पहचान को मिटाने की साजिश रची जा रही है। इस परियोजना के चलते पुरानी काशी का अस्तित्व लगभग समाप्ति की तरफ है।

कुछ जानकार कहते हैं कि नेहरू गांधी परिवार पर लगातार तंज करने वाले पीएम मोदी एक बार फिर इंदिरा गांधी का अनुसरण करते नज़र आए। इस बात पर लोगों को विश्वास नहीं होगा पर वास्तविकता ये है कि जिसे मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट बताया जा रहा है वह परियोजना आज से 42 साल पहले 1976 में कांग्रेस सरकार में तैयार हुई थी। यह प्रोजेक्ट तब के सीएम नारायण दत्त तिवारी ने तैयार कराया था। इसकी जानकारी जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को हुई तो वह गुस्से से लाल हो गई थीं। उन्होंने अपना विशेष दूत काशी भेजा और सारी जानकारी हासिल की। पूरी जानकारी मिलते ही उन्होंने यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को दिल्ली तलब किया। तिवारी और इंदिरा जी के बीच तल्ख बातचीत हुई और इंदिरा गांधी ने सख्त रुख को देखते हुए परियोजना को तत्काल प्रभाव से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

बताया जाता है कि 42 वर्ष पूर्व तैयार इस प्रोजेक्ट के सूत्रधार एक आयुक्त थे। इतने वर्षों तक वह फाइल आयुक्त कार्यालय में दबी रही। मोदी राज में उसे झाड़ पोंछ कर 2015 में फिर से निकाला गया और मौजूदा प्रधानमंत्री व वाराणसी के सांसद को उसकी जानकारी दी गई और वह परियोजना पीएम का ड्रीम प्रोजेक्ट बन गई।

मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘विश्वनाथ कॉरिडोर परियोजना’ नया नहीं है यह अब साफ हो गया है। इसका पूरा वृतांत पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कोर ग्रुप की सदस्य रहीं पुपुल जयकर  पुस्तक, ‘इंदिरा गाँधी, ए बायोग्राफी’ में मिलता है। प्रसिद्ध प्रकाशक पेग्विन ब्लू द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक पहली बार 1992 में बाजार में आई थी। उसके बाद 1993 फिर 1995 में उसके और संस्करण आये। इस पुस्तक के चैप्टर-04 में जयकर ने 1976 की गर्मियों का जिक्र करते हुए लिखा है कि, इंदिरा जी को कहीं से यह पता चला कि काशी में व्यापक पैमाने पर तोड़फोड़ की जा रही है। ऐसे में उन्होंने मुझे बुलाया और काशी जा कर वस्तुस्थिति की जानकारी ले कर उन्हें अवगत कराने का निर्देश दिया। उनके कहने पर मैं बनारस आई और काशी विश्वनाथ मंदिर जाने के लिए छत्ताद्वार के तरफ से जैसे ही अंदर जाने की कोशिश की तो वहां कुछ तोड़फोड़ दिखी। इस पर मैने तत्कालीन कमिश्नर से जानकारी चाही तो वह उन्होंने कहा कि यूपी के राज्यपाल की इच्छा है कि ज्ञानवापी से कार सीधे विश्वनाथ गर्भ गृह तक चली जाए। इस पर मैंने कमिश्नर से सवाल किया कि यह कैसे संभव है, गली में कार कैसे जाएगी, तो कमिश्नर ने कहा कि छत्ता द्वार से विश्वनाथ मंदिर तक रास्ते में पड़ने वाले मंदिरों, भवनों को गिरा दिया जाएगा। विग्रह हटा दिए जाएंगे और रास्ता सुगम हो जाएगा। इस पर मैने गहरी आपत्ति जताई कहा कि यह तो काशी की हजारों साल पुरानी संस्कृति, सभ्यता, परंपरा और वास्तु से खिलवाड़ होगा इसे तत्काल रोक दिया जाए। इस पर कमिश्नर ने कहा कि यह नहीं हो सकता क्योंकि यह राज्यपाल का निर्देश है। ऊपर से हम सभी पर दबाव है। इस पर मैंने उन्हें बताया कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मुझे बनारस भेजा है और जब तक मैं दिल्ली जा कर पूरे घटनाक्रम से अवगत नहीं करा देती और उनका कोई निर्देश जारी नहीं होता तब तक काम रोक दिया जाए। अब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम सुन कर कमिश्नर ने कार्रवाई रोकने का निर्देश दिया।

पुपुल जयकर ने अपनी पुस्तक में आगे लिखा है कि जब दिल्ली पहुंच कर मैंने सारी जानकारी से इंदिरा जी को अवगत कराया तो वह गुस्से से लाल हो गईं। अपने निजी सचिव आरके धवन को बुला कर उन्होंने यूपी के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी तत्काल दिल्ली तलब किया। इधर नारायण दत्त तिवारी दिल्ली पहुंचे और प्रधानमंत्री आवास पहुंचे तो गुस्से से लाल इंदिरा जी जैसे उनका इंतजार ही कर रही थीं। तिवारी जी के पहुंचते ही वह फट पड़ीं। पूछा ये क्या हो रहा है यूपी में और खास तौर पर काशी में। तिवारी जी निरुत्तर हो गए। तब इंदिरा जी ने कड़े लफ्जों में कहा था कि सारी कार्रवाई तत्काल प्रभाव से रोकी जाए। काशी को उसके वर्तमान स्वरूप में रहने दिया जाए। उसके साथ किसी तरह का कोई खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। और उसी वक्त तोड़फोड़ की कार्रवाई रोक दी गई और परियोजना ठंडे बस्ते में डाल दी गई थी।

पुपुल जयकर लिखती हैं कि इंदिरा जी के कहने पर जब 1976 की गर्मियों में बनारस आई थी तो मुझे यहां के लोगों ने बताया था कि सदियों से ये गलियां इसी तरह हैं। इसके साथ कभी किसी ने छेड़छाड़ करने की कोशिश नहीं की। इन गलियों में ऐसे भी स्थान हैं जहां कभी सूर्य की किरणें तक नहीं पहुंचतीं। ऐसी काशी के प्राचीन स्वरूप को तहस-नहस करने की बात जान कर इंदिरा जी ने माथा पकड़ लिया वह गहरी चिंता में डूब गईं। काफी दुःखी हुई थीं।

इस पूरे घटनाक्रम पर काशी को नजदीक से जानने वाले संकटमोचन मंदिर के महंत और आईआईटी बीएचयू के प्रोफेसर विश्वंर नाथ मिश्र ने कहा कि यह सही है कि 1976 में ऐसा कुछ घटनाक्रम हुआ था जिसका उल्लेख जयकर की किताब में मिलता है। उन्होंने कहा कि काशी तो गलियों का शहर है ही। इन गलियों की खूबसूरती को ही देखने देश विदेश से लोग आते रहे हैं। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के इर्द-गिर्द के मंदिर और घरों में बसे देव विग्रहों का संबंध बाबा विश्वनाथ जो भक्त बाबा दरबार तक नहीं जा पाते थे वो इन देव विग्रहों का ही दर्शन कर धन्य हो लेते थे। इतना ही नहीं चाहे श्री गणेश का मंदिर हो या हनुमान जी का या अन्य किसी अन्य देव का वो सब एक दूसरे से जुड़े हैं। इसीलिए तो काशी को गलियों और मंदिरों का शहर कहा गया। इस चीज को देश की सबसे बड़ी तानाशाह कही जाने वाली लौह महिला ने समझा था। काशी के महात्म्य को उन्होंने समझा था तब उन्होंने उसे रुकवा दिया। हालांकि तब यह सरकारी परियोजना नहीं थी। लेकिन अब तो सरकार ही सब कुछ जानते हुए काशी को, काशी की संस्कृति, सभ्यता को नष्ट करने पर तुली है तो अब बाबा विश्वनाथ ही न्याय करेंगे।

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