• [EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 16 May, 2019 01:47 PM | Total Read Count 136
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बंगाल के ‘जादूगर’ करतब कब मप्र में दिखाएंगे

राकेश अग्निहोत्रीः  लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण में सबसे ज्यादा चर्चा जिस पश्चिम बंगाल की... वहां सवाल खड़ा हो चुका क्या भाजपा का जादू मतदाताओं के सिर चढ़कर बोलेगा तो कमल कितनी सीटों पर खिलेगा... यहां चुनाव में भड़की हिंसा और आरोप-प्रत्यारोप का गिरता स्तर चुनाव को सियासी युद्ध में तब्दील कर चुका है . देश के इतिहास में पहली बार बंगाल में इस बार चुनाव आयोग ने प्रचार एक दिन पहले ही रोक दिया...प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी के लिए जिस तरह बंगाल का चुनाव उनकी साख से जुड़ गया जो गौर करने लायक...

क्योंकि कांग्रेस और वामपंथियों  को पीछे छोड़ते हुए सीधे मुकाबले में भाजपा ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को  चुनौती देती हुई नजर आ रही है ... अमित शाह के रोड शो के दौरान ईश्वरचंद विद्यासागर की मूर्ति तोड़े जाने की घटना के बाद बंगाल की सियासत कुछ ज्यादा ही गरमा   चुकी है.. हिंदुत्व तो ध्रुवीकरण के बीच बंगाल की अस्मिता चुनाव का मुद्दा बन चुका है.. कोलकाता में  ममता का विरोध मार्च हो  या फिर इससे पहले भाजपा का दिल्ली में जंतर मंतर पर धरना फोकस  बंगाल चुनाव पर फोकस बन चुका है.. जिसने प्रियंका गांधी के वाराणसी के रोड शो को भी पीछे छोड़ दिया..

ऐसे में देखना दिलचस्प होगा मोदी मैजिक और शाह की संगठन क्षमता यहां क्या गुल खिलाएगी ...इसके लिए 23 मई के चुनाव परिणाम का इंतजार करना होगा ...लेकिन भाजपा  यदि मुकाबले में खड़ी नजर आ रही तो उसकी वजह है प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय और सह प्रभारी अरविंद मिलन की पश्चिम बंगाल में जमावट और आक्रमक चुनाव के लिए जरूरी मेहनत... जिन्होंने लोकतंत्र बचाने के लिए ममता को हटाने का आह्वान किया तो ममता बनर्जी को इसमें मोदी शाह की साजिश नजर आ रही...

संयोग से इन दोनों नेताओं का रिश्ता मध्य प्रदेश से जिनकी शुरुआत अलग-अलग समय में इंदौर से हुई और अलग-अलग जिम्मेदारी निभाते हुए अब दोनों मध्य प्रदेश से बाहर राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के अंदर अपने पैर जमा चुके हैं.. तो बड़ा सवाल  मोदी शाह का मिशन पश्चिम बंगाल यदि कामयाब सिद्ध हुआ तो क्या कैलाश और अरविंद की इस जोड़ी का बढ़ता सियासी कद  उनकी सम्मानजनक और सक्रियता के साथ मध्य प्रदेश वापसी संभव कराएगा... जहां सत्ता हाथ से जाने के बाद प्रदेश भाजपा को संगठन में नई जान फूंकने वाले नेता की दरकार महसूस होने लगी.. जो सत्ता वापसी कर चुकी कांग्रेस खासतौर से प्रबंधन क्षमता के धनी मुख्यमंत्री कमलनाथ को बदलते सियासी परिदृश्य में चुनौती दे सकें...

पश्चिम बंगाल में भड़की चुनावी हिंसा और गंभीर आरोप प्रत्यारोप आक्रमक प्रचार के बीच यदि भाजपा का जादू चला तो मोदी और शाह के अलावा इसका श्रेय जिन दो नेताओं को जाएगा उसमें कैलाश विजयवर्गीय और अरविंद मेनन प्रमुख होंगे ..इसकी अपनी वजह  क्योंकि भाजपा जो मोदी सरकार के रहते लगातार पिछले 5 साल में अलग-अलग राज्यों में अपने पैर पसार चुकी ...चाहे फिर वह उत्तर से दक्षिण या फिर पूर्वोत्तर से लेकर कश्मीर ही क्यों न हो...

लेकिन यह भी सच है कि लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा फोकस भाजपा ने जिस पश्चिम बंगाल में बनाया  वहां ममता बनर्जी से सीधी लड़ाई अब टकराहट में तब्दील हो चुकी... चाहे फिर वह शब्दों की मर्यादा हो या फिर धरना प्रदर्शन में रोड शो के साथ सियासी हमले लड़ाई किसी जंग में तब्दील हो चुकी... ममता बनर्जी है कि वह हार मानने को तैयार नहीं तो अमित शाह और उनकी टीम जीत के लिए किसी भी हद तक जाने का मानस बना चुकी है...

ऐसे में पिछले 48 घंटे में चुनावी सभाओं में मोदी का भाषण हो या फिर रोड शो के जरिए अमित शाह की चुनौती मुख्यमंत्री रहते ममता बनर्जी फ्रंट फुट पर ही अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही.. जहां स्पेशल फोर्स पहुंच चुकी तो चुनाव आयोग की भूमिका पर भाजपा सवाल खड़े करने को मजबूर हुई.. भाजपा को उम्मीद है कि महागठबंधन यदि उत्तर प्रदेश में उनकी सीट कम करेगा तो इसकी भरपाई पश्चिम बंगाल से संभव है ..जहां प्रदेश प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने अभी तक 23 लोकसभा क्षेत्रों में जीत का दावा करते हुए अंतिम चरण में चार से पांच और सीट जीतने का भरोसा जताया है... जो बंगाल के पंचायत चुनाव से सक्रिय है तो लक्ष्य लोकसभा के बाद विधानसभा चुनाव को लेकर आगे बढ़ रहे हैं...

समीपवर्ती झारखंड से लगी सीटों पर भाजपा अपनी पैनी नजर लगाए हुए उनके दावे पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं.. फिलहाल भाजपा के पास बंगाल में 2 सीटें ही है .. जिस तरह मोदी और शाह की रैली सफल साबित हुई उसकी जमीन कहीं ना कहीं शाह की दूरदर्शिता के चलते कैलाश और मेनन द्वारा तैयार की गई..  विजयवर्गी बहुत पहले ही ममता सरकार के निशाने पर आ चुके थे और अमित शाह के रोड शो और नरेंद्र मोदी की रैली से पहले बंगाल की पुलिस से उनकी तीखी झड़प में उन्हें एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है ...चाहे फिर वजह सहयोगी से प्रभारी अरविंद मेनन  पर हमला या फिर मोदी और शाह के बैनर पोस्टर हटाने की हो या फिर रोड शो के दौरान भड़की हिंसा और विद्यासागर की मूर्ति तोड़े जाने का विवाद...

कैलाश इंदौर से दूर ज्यादातर समय बंगाल में ही बिता रहे इंदौर में ताई सुमित्रा महाजन चुनाव नहीं लड़ रही तो भाई कैलाश विजयवर्गीय भी शहर से बाहर है ..जबकि मालवा में अंतिम चरण के लिए मतदान होना है और कमलनाथ के साथ प्रियंका गांधी ने कांग्रेसियों में नया जोश भर कर भाजपा की घेराबंदी तेज कर दी है.. राष्ट्रीय राजनीति का फोकस यदि पश्चिम बंगाल पर तो यहां मोदी और शाह के निशाने पर ममता बनर्जी... शाह के रोड शो में भड़की हिंसा उसके बाद नरेंद्र मोदी की बंगाल में जनसभा तो उसके बाद ममता बनर्जी का विरोध मार्च.. दोनों एक दूसरे को न सिर्फ चुनौती देते हुए नजर आए..

बल्कि कोई हार मानने को तैयार नहीं ... उन्हें मालूम है चुनाव के अंतिम चरण में एक एक सीट भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के लिए बहुत मायने रखती है.. जहां तक बात कैलाश विजयवर्गीय और अरविंद मेनन की जोड़ी की तो इनके लिए मिशन बंगाल किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं.. सियासत में संभावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. बंगाल में भाजपा के लिए खोने को कुछ भी नहीं लेकिन यदि उपलब्धि के नाम पर सीट दो से बढ़कर 15 तक भी पहुंचती ..तो कैलाश और मेनन की जोड़ी का महत्व भी बढ़ना तय है.. इस जोड़ी को इंदौर के पुराने संबंध ने एक बार फिर करीब लाकर खड़ा कर दिया ..

2003 में दिल्ली में युवा मोर्चा से जुड़े रहे अरविंद मेनन विधानसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश में अपनी शुरुआत धार इंदौर से ही की थी.. जिन्होंने पहले इंदौर संभाग फिर मालवा उसके बाद महाकौशल में संगठन मंत्री से लेकर प्रदेश के सह संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी निभाई... तो 2014 विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के साथ  बतौर संगठन महामंत्री भाजपा की जीत में बड़ी भूमिका निभाई ..इस बीच कैलाश विजयवर्गीय से अरविंद मेनन के रिश्तो में खटास की आई ..लेकिन अब दोनों के मतभेद दूर हो चुके और करीब भी आ चुके..

परिस्थितियां बदली यदि कैलाश विजयवर्गी को विधायक रहते दिल्ली में राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी निभाना पड़ी ..तो हरियाणा के हीरो ने अमित शाह की टीम में अपनी पहचान बनाई.. जिनके लिए राज्यसभा में जाने पर लोकसभा चुनाव लड़ने के भी अवसर मिले.. लेकिन पुत्र आकाश विजयवर्गी को विधायक बनाने के बाद कैलाश राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रभावी मौजूदगी दर्ज करा रहे.. पिछले विधानसभा चुनाव में जरूर वह मध्यप्रदेश में सक्रिय नजर आए.. बदलते राजनीतिक परिदृश्य में जब भाजपा सत्ता से बाहर जा चुकी  और मध्य प्रदेश संगठन की कमजोर कड़ियों के चलते उसके सामने चुनौतियों का अंबार है..

तब नए फार्मूले में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज के साथ नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ,संगठन महामंत्री सुहास भगत और प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह मिलकर कमलनाथ सरकार का मुकाबला करने को मजबूर हुए.. तब लोकसभा चुनाव के बाद संगठन में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.. कैलाश विजयवर्गीय का बयान चर्चा में रहा जिसमें उन्होंने बॉस के इशारे पर कभी भी कांग्रेस सरकार को गिरा देने का दावा किया था..

फिलहाल इस लोकसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में यदि कांग्रेस उम्मीदवार भाजपा को कड़ी टक्कर दे रहे ..तो उसकी वजह सिर्फ कांग्रेस का सरकार में रहना और कमलनाथ का बेहतर प्रबंधन ही नहीं है बल्कि लगातार भाजपा संगठन का कमजोर साबित होना भी है.. तो देखना दिलचस्प होगा पश्चिम बंगाल मे यदि कैलाश विजयवर्गी और अरविंद मेनन भाजपा के जादूगर साबित हुए.. तो क्या इस जोड़ी के लिए बदलती भूमिका में मध्य प्रदेश वापसी का मार्ग प्रशस्त होगा.. तो सवाल आखिर किस जिम्मेदारी के साथ चाहे फिर वह कैलाश विजयवर्गी की हो या अरविंद मेनन जो फिलहाल कैलाश राष्ट्रीय महासचिव है .

कैलाश का अभी तक कार्य क्षेत्र बरही मध्य प्रदेश में मालवा तक सीमित रहा हो... लेकिन कार्यकर्ताओं को उनका हक दिलाने की लड़ाई  लड़ते हुए उन्होंने  पूरे प्रदेश में अपने समर्थक बनाएं.. जिनके संघ कनेक्शन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता तो भाजपा में उनकी पहचान एक जिद्दी और आक्रमक नेता की मानी जाती.. प्रबंधन के मोर्चे पर दूसरे भाजपा नेताओं की तुलना में उनकी अपनी पहचान है.. हरियाणा चुनाव के बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई थी जिनकी गिनती अमित शाह के भरोसेमंद नेता के तौर पर होती है.. तो यह भी सच है कि पश्चिम बंगाल का टास्क शाह ने मोदी को भरोसे में लेकर उन्हें सौंपा है..

जिसकी सफलता और असफलता उनकी अगली भूमिका तय कर सकता.. पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए  कैलाश के लिए  अगले  छह माह बहुत मायने रखते.. तो दूसरी ओर अरविंद मेनन मध्य प्रदेश से जाने के बाद प्रकल्प के प्रभारी की जिम्मेदारी निभाते हुए बंगाल में सह प्रभारी का दायित्व निभा रहे .. जिन्हें विवाद के चलते सिंहस्थ के दौरान ही  मध्य प्रदेश छोड़कर जाना पड़ा था.. जो फिलहाल संघ के प्रचारक भी है और मध्य प्रदेश में संगठन महामंत्री रह चुके..

मेनन ने कम समय में जिले से प्रदेश में अपनी पहचान बनाई तो अब राष्ट्रीय स्तर पर अमित शाह के भरोसेमंद बनकर उभरे.. जिस राह पर बीजेपी केंद्रीय स्तर पर बढ़ चुकी और बेहतर प्रबंधन के साथ विरोधियों को अपने पाले में लाकर खड़ा कर रही वह काम मिलन मध्यप्रदेश में पहले ही शुरू कर चुके थे..

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