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टाल-मटोल का औचित्य नहीं

हैरतअंगेज है कि अयोध्या विवाद से जुड़ा एक पक्ष इस पर न्यायिक निर्णय को टालना चाहता है। उसने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि इस पर फैसला जुलाई 2019- यानी अगले आम चुनाव के बाद- तक टाल दिया जाए। बेशक राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद ने भारतीय राजनीति पर व्यापक असर है। इससे चुनावी माहौल प्रभावित हो सकता है। लेकिन अपने देश में हम समय चुनाव होते रहते हैं। इसके मद्देनजर न्यायिक प्रक्रियाएं टाली जाएं, यह किसी नजरिए से वांछित नहीं है। स्पष्टतः अयोध्या मामले को और लटकाने के लिए चुनाव पर संभावित प्रभाव का तर्क औचित्यहीन है। कानून-व्यवस्था की समस्या खड़ी होने का अंदेशा भी टाल-मटोल का कारण नहीं हो सकता। इस प्रकरण या ऐसे किसी मामले में जब कभी निर्णय आएगा, कुछ अशांति की आशंका रहेगी। तब शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी तत्कालीन सरकार पर होगी। इसलिए स्वागतयोग्य है कि सुप्रीम कोर्ट ने अंततः अयोध्या विवाद के मालिकाने से संबंधित पहलू पर अगले 8 फरवरी से सुनवाई करने का फैसला किया है।

साफ तौर पर हर न्यायिक निर्णय की तरह इस मामले में भी फैसला उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा। सुप्रीम कोर्ट उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक विवादित भूमि का स्वामित्व तय करेगा। दरअसल, उचित यही है कि कोर्ट की कार्यवाही साक्ष्यों के दायरे तक सीमित रहे। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इससे आगे जाने की कोशिश की थी। ये निर्णय देने के बजाय कि अयोध्या में विवादित 2.77 एकड़ जमीन पर किसका कानूनी स्वामित्व है, उसने एक ऐसा समाधान पेश किया, जिससे विवाद से संबंधित कोई पक्ष संतुष्ट नहीं हुआ। 2010 में दिए अपने फैसले में उच्च न्यायालय ने विवादित  जमीन को सुन्नी वक्फ़ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच विभाजित करने का सुझाव दिया था। जबकि वक्फ़ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा का पूरी जमीन पर दावा है। जबकि मालिकाने का मसला जब तक हल नहीं होगा, ये विवाद खिंचता रहेगा। इस मामले को लेकर काफी हिंसा और कड़वाहट हो चुकी है। अतः पूरे देश का हित इसमें है कि इस पर यथाशीघ्र स्पष्ट निर्णय आए।

उसके बाद विवाद से जुड़े पक्ष आपसी समझदारी से कोई सद्भावपूर्ण हल निकलाना चाहें, तो बेशक वह स्वागत-योग्य होगा। कोई राजनीतिक समाधान निकालता है, तो उस पर राजनीति के दायरे में बहस-मुबाहिशा होगी। लेकिन न्यायपालिका में आड़ लेकर मामले को लटकाए रखना उचित नहीं है। अब सुप्रीम कोर्ट के रुख से चूंकि इस मामले का न्यायिक हल निकलने की उम्मीद बढ़ी है, तो अपेक्षित है कि सभी पक्ष उसका इंतजार करें।

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