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ये है अपना विकास!

संपादकीय-2
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उद्घाटन से कुछ ही घंटे पहले बिहार में एक बांध का टूट गया। इससे जुड़े तथ्यों पर गौर कीजिए। ये डैम भागलपुर जिले के कहलगांव में बन रहे उस बटेश्वर गंगा पंप कैनाल प्रोजेक्ट का हिस्सा है, जिसे 1977 में योजना आयोग की मंजूरी मिली थी। तब इस पर 14 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान लगाया गया था। परियोजना पर वास्तविक काम मंजूरी के आठ साल बाद (यानी 1985 में) जाकर शुरू हो पाया। उसके 32 साल बाद (यानी 2017 में) जाकर ये बांध चालू होने की स्थिति में आया। तब तक इस पर लगभग 400 करोड़ रुपए खर्च हो चुके थे। समय और लागत रकम दोनों गौरतलब है।

अब त्रासदी यह है कि इतने लंबे इंतजार और आरंभिक अनुमानित लागत से लगभग 35 गुना ज्यादा खर्च होने के बाद भी उस बांध के लाभ फिर लोगों की पहुंच से दूर हो गए हैं। इसके लिए कौन जवाबदेह है? चूंकि अपने देश में उत्तरदायित्व तय नहीं होते, इसलिए इस सवाल को कोई गंभीरता से नहीं लेगा। बहरहाल, एक और तथ्य पर अवश्य देने योग्य है। बिहार के जल संसाधन मंत्री ललन सिंह ने कहा कि नहर बनने के बाद एनटीपीसी ने सुरंग खोद कर उसके नीचे से अंडरपास बनाया। इससे नहर कमजोर हो गई। इस बात से अपने देश में होने वाले सार्वजनिक निर्माण को वो बुनियादी हकीकत सामने आती है, जिसकी ओर हम सबका ध्यान अक्सर जाता है, लेकिन जिसका कोई हल नहीं निकलता। मुद्दा है कि क्या अंडरपास बनाने काम ना-जानकार लोगों ने किया, जिन्हें ऐसे निर्माण का मूलभूत ज्ञान नहीं था? फिर यह विभिन्न सरकारी विभागों में उचित तालमेल ना होने की भी एक मिसाल है।

और ये सारी कहानी बताती है कि अपने देश में विकास परियोजनाएं कैसे बनाई और लागू की जाती हैं। इनमें उभरे बहुत से पहलुओं को देश की अधिकांश विकास परियोजनाओं में आसानी से ढूंढा जा सकता है। और ये प्रकरण यह भी बताता है कि अपने देश में सार्वजनिक धन, विकास और लोगों की आंकाक्षाओं या परेशानियों को कितने हलके से लिया जाता है। परियोजना पूरा होने में देर और उनकी लागत बढ़ते जाने की बातें इतनी पुरानी हो चुकी हैं कि उन्हें कहना महज दोहराव भर लगता है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार चाहे जिस पार्टी की बने, वह ऐसे मामलों में उसी नौकरशाही पर निर्भर रहती है, जिसकी अक्षमताएं और भ्रष्ट आचरण इस समस्या के लिए बुनियादी रूप से जिम्मेदार है।

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