उलटा पड़ता हर दांव

देश के पूर्वोत्तर राज्य असम में बीजेपी का हर दांव उल्टा पड़ रहा है। वह चाहे एनआरसी का मामला हो या फिर नागरिकता अधिनियम का। अब छह जातीय गुटों को अनुसूचति जनजाति का दर्जा देने के फैसले का भी यही हश्र हो रहा है। नागरिकता अधिनियम के खिलाफ आदिवासी संगठन असम बंद तक बुला चुके हैं। यह बात दीगर है कि फिलहाल यह मामला नागरिकता अधिनियम के विरोध के नीचे दब-सा गया है। लेकिन आने वाले दिनों में यह मुद्दा तूल पकड़ सकता है। लेकिन दरअसल इस विरोध के बीज राज्य के जटिल सामाजिक ताने-बाने में छिपे हैं। असम की छह जनजातियों, कोच राजबंशी, ताई अहोम, चूटिया, मोरान, मटक और चाय जनजाति को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग यूं तो काफी पुरानी है, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले बंगाईगांव में बीजेपी के प्रचार अभियान के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इसका भरोसा देने के बाद इस मांग ने जोर पकड़ा। उसके बाद इस मुद्दे पर कई दफा बैठकों के बावजूद इस दिशा में प्रगति नहीं हो सकी। अब नागरिकता (संशोधन) विधेयक के मुद्दे पर राज्यव्यापी बवाल के बाद केंद्र सरकार ने लोगों का ध्यान मोड़ने के लिए मंत्रिमंडल की बैठक में इन जनजातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने संबंधी प्रस्ताव को मंजूदी दे दी। फिलहाल इसे संसद की मंजूरी मिलनी है। इसके बाद दूसरे आदिवासी संगठन इसके विरोध में लामबंद होने लगे हैं। उनकी दलील है कि इन छह जनजातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने के बाद आदिवासियों के हितों को नुकसान पहुंचेगा।

असम में सैकड़ों जातीय समूह हैं। इनमें से ज्यादातर समूह खुद के पिछड़ा होने का दावा करते हुए अनुसूचित जनजाति के दर्जे की मांग करते रहे हैं। फिलहाल केंद्र ने जिन छह जनजातियों को यह दर्जा देने का फैसला किया वह असम सरकार की ओर से अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सूची में शामिल हैं। यह मामला बेहद जटिल है। मिसाल के तौर पर चाय जनजाति में ओरांग व घटवार समेत कम से कम 96 जातीय समूह शामिल हैं। इन छह समूहों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने के बाद राज्य में आदिवासियों की आबादी मौजूदा 13 फीसदी से बढ़ कर 50 फीसदी से ज्यादा हो जाएगी। इसका असर विधानसभा में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों पर भी होगा। बेशक सरकार ने इस फैसले के जरिए नागरिकता विधेयक का विरोध कर रहे स्थानीय लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास किया है। लेकिन इससे राज्य की मौजूदा परिस्थिति के और बिगड़ने का ही अंदेशा है। 

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