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आरटीआई ऐक्ट में बेज़ा बदलाव

लंबे इंतजार के बाद केंद्र सरकार ने सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक- 2018 को सार्वजनिक कर दिया है। विधेयक के अनुसार केंद्रीय सूचना आयुक्तों और राज्य सूचना आयुक्तों का वेतन और उनके कार्यकाल को केंद्र सरकार द्वारा तय करने का प्रावधान रखा गया है। अभी तक मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त का वेतन मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त के वेतन के बराबर होता था। वहीं राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त का वेतन चुनाव आयुक्त और राज्य सरकार के मुख्य सचिव के वेतन के बराबर होता था। आरटीआई एक्ट के अनुच्छेद 13 और 15 में केंद्रीय सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों का वेतन, भत्ता और अन्य सुविधाएं निर्धारित करने की व्यवस्था दी गई है। नरेंद्र मोदी सरकार इसी में संशोधन करने के लिए बिल लेकर आ रही है। आरटीआई के क्षेत्र में काम करने वाले लोग और संगठन इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस संशोधन के ज़रिये सरकार आरटीआई कानून को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

ये बिल सूचना आयोग के कद को छोटा करने की कोशिश है। ध्यान दिलाया गया है कि भारत का आरटीआई कानून दुनिया के बेहतरीन कानूनों में से एक है, लेकिन इस पर अमल करने में खामियां रही हैं। इसलिए आरटीआई एक्ट में किसी तरह का बदलाव नहीं होना चाहिए। जरूरत इसे और पुख्ता ढंग से लागू करने की है। इस स्थिति में अगर आरटीआई कानून कमज़ोर किया जाता है, तो ये देश की जनता के लिए बहुत बड़ी हानि होगी। इस बिल को लेकर प्री-लेजिस्लेटिव कंसल्टेशन पॉलिसी यानी कि पूर्व-विधायी परामर्श नीति का पालन नहीं किया गया है। नियम के मुताबिक अगर कोई संशोधन या विधेयक सरकार लाती है, तो उसे संबंधित मंत्रालय या डिपार्टमेंट की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाता है और उस पर आम जनता की राय मांगी जाती है। लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ नहीं किया गया। इस बिल को 5 अप्रैल 2018 को ही तैयार कर लिया गया था।

लेकिन इसे इतने दिनों तक सार्वजनिक नहीं किया गया। अब 12 जुलाई को मानसून सत्र के लिए लोकसभा के कार्यदिवसों की सूची जारी कर दी गई है। उसमें से एक बिल सूचना का अधिकार (संशोधन) बिल- 2018 भी है। इसके बाद अब जाकर बिल के विवरण को जारी किया गया है। इससे उन आशंकाओं की पुष्टि हो गई, जिन्हें पहले जताया जा रहा था। अतः आईटीआई कार्यकर्ताओं का विरोध जायज है। 

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