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अफगानिस्तान में नया अवसर

अफगानिस्तान में अपने हितों को अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति दिलवाना भारतीय कूटनीति का पुराना मकसद रहा है। भारत ने वहां विकास कार्यों में भारी निवेश किया और इसकी अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा हुई। लेकिन जब सवाल सुरक्षा हितों का आता था, तो अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया उतनी अनुकूल नहीं होती थी। इसमें एक बड़ा पहलू पाकिस्तान है। पाकिस्तान यह नहीं मानता कि अफगानिस्तान में भारत का कोई वैध सुरक्षा हित है। चूंकि अफगानिस्तान में स्थिरता लाने के प्रयासों में अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश पाकिस्तान के सहयोग को जरूरी समझते रहे, इसलिए इस मुद्दे पर अक्सर वे चुप्पी साध लेते थे। लेकिन डोनल्ड ट्रंप के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद स्थितियां बदली हैं। पिछले 21 अगस्त को ट्रंप ने अपनी नई अफगान नीति घोषित की। इस मौके पर ट्रंप ने भारत से अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में ज्यादा बड़ी भूमिका निभाने की अपील की थी। उसके बाद दक्षिण एवं मध्य एशिया मामलों की अमेरिकी सहायक विदेश मंत्री एलिस वेल्स का महत्त्वपूर्ण वक्तव्य में आया, जिसमें उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में भारत के वैध सुरक्षा हित हैं। इसके साथ ही ट्रंप प्रशासन ने दो-टूक कहा है कि पाकिस्तान स्थित दहशतगर्द गुट अफगानिस्तान में अस्थिरता फैलाने में जुटे हुए हैं। 

अमेरिकी नीति में यह स्पष्ट परिवर्तन है। इससे भारत को अफगानिस्तान में अपने रणनीतिक उद्देश्यों के अनुरूप पहल करने का नया अवसर मिला है। इसी पृष्ठभूमि में अफगानिस्तान के विदेश मंत्री सलाहुद्दीन रब्बानी भारत आए। जाहिर है, उनकी यात्रा पर खास निगाहें टिकी थीं। रब्बानी ‘भारत-अफगानिस्तान भागीदारी परिषद’ की बैठक में हिस्सा लेने के लिए नई दिल्ली आए। इस बार परिषद की बैठक लगभग एक साल देर से हुई। मगर उल्लेखनीय है कि भारत के नजरिए से अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां अनुकूल होते ही ये बैठक आयोजित हुई। बैठक के बाद जारी साझा बयान में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रब्बानी ने हालांकि विज्ञप्ति में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, लेकिन कहा कि भारत और अफगानिस्तान “सीमा से पार से प्रायोजित आतंकवाद और (आतंकवादियों के) सुरक्षित अड्डों एवं शरणस्थली से उत्पन्न खतरों”का एकजुट होकर मुकाबला करेंगे। स्पष्टतः अफगानिस्तान सरकार अपनी सुरक्षा नीति में भारत को खास भूमिका देने को तैयार है। 

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