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ये सरकार की है नाकामी

यह तो अब जाना-पहचाना तथ्य है कि देश का बैंकिंग तंत्र इन दिनों गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के बोझ से जूझ रहा है। एक सर्वे के मुताबिक दुनिया में इटली के बाद, भारत में सबसे ज्यादा एनपीए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के मुताबिक देश में कुल एनपीए का 90 फीसदी हिस्सा सरकारी बैंकों के खाते से गया है। ऐसे में समय रहते अगर इस समस्या से छुटकारा नहीं पाया गया, तो देश की बैंकिंग व्यवस्था चरमरा सकती है। बैंक की ओर से दिए गए ऋण का लेनदार की ओर से समयसीमा के भीतर भुगतान ना करना या भुगतान करने में देरी करना एनपीए कहलाता है। ऐसे ऋणों को "बैड एसेट" भी कहा जाता है। भारत में अगर लेनदार 90 दिन या इससे अधिक समय तक कर्ज की किश्त ना चुकाए तो उस ऋण को एनपीए की श्रेणी में डाल दिया जाता है। किसी अर्थव्यवस्था में आने वाली अस्थिरता का कारण अर्थव्यवस्था में ही छिपा होता है।

कुछ ऐसा ही एनपीए के मामले में भारत के साथ हुआ है। 2002-2006 के बीच का समय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए काफी अनुकूल रहा। अर्थव्यवस्था तब इतनी मजबूत थी कि साल 2007-08 में आए वैश्विक आर्थिक संकट का असर प्रत्यक्ष रूप से देश के बैंकिंग सिस्टम पर नहीं दिखा। देश के बैंकिंग तंत्र की इसी मजबूती ने ना केवल विदेशी निवेशकों को बल्कि घरेलू निवेशकों को भी भारत में निवेश करने के लिए उत्साहित किया। जिसके चलते बैंकों ने खूब ऋण बांटा, लेकिन बैंकों के कारोबार में वृद्धि उम्मीद के मुताबिक नहीं रही और ये कर्ज समय पर नहीं चुकाए गए। जिसके चलते देश में एनपीए की समस्या खड़ी हो गई। दरअसल, अर्थव्यवस्था में तेजी हमेशा उम्मीद मुताबिक नहीं होती। बैंकों ने अति आशावादी रुख अपनाते हुए कर्ज दिए। इसके बाद जब बैंक कर्ज में फंसने लगे, तब भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। दरअसल, अर्थव्यवस्था अच्छा कर रही होती है तब भी बैंकों को अधिक सजग रहने की जरूरत होती है। मगर अपने देश में ऐसा नहीं हुआ। नतीजतन, देश के कुल जीडीपी में एनपीए की हिस्सा तकरीबन 9.6 फीसदी है, जो साल 2018 के आम बजट का आधा है। वैसे 1997-2002 के दौरान भी एनपीए समस्या सामने आई थी।

लेकिन आर्थिक सुधारों और बुनियादी परियोजनाओं की तेजी ने उस वक्त इसे संकट बनने नहीं दिया। मगर आज हालात अलग हैं, तो यह सरकारी तंत्र की नाकामी का ही नतीजा है।

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