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कैसे होंगी सड़कें सुरक्षित?

यह तो जाना-पहचान तथ्य है कि भारत में सड़क यात्रा असुरक्षित है। हर साल सवा लाख से ज्यादा लोगों की जान सड़क हादसों में जाती है। इससे कहीं ज्यादा विकलांग या घायल होते हैं। इन हादसों के कई कारण बताए जाते हैं। मसलन, सड़कें टूटी-फूटी अवस्था में होती हैं और स्पीड ब्रेकर मनमाने तरीके से बने होते हैं। इसके अलावा भीड़ और अनियंत्रित ड्राइविंग की चर्चा भी होती है। अनियंत्रित ड्राइविंग के पीछे कारण क्या हैं, यह समझना तो एक ताजा अध्ययन रिपोर्ट सहायक हो सकती है। सेवलाइफ फाउंडेशन नामक एक गैर-सरकारी संस्था की इस रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत में 60 फीसदी लोगों को स्टीयरिंग पकड़ना सीखने के पहले ही ड्राइविंग लाइसेंस मिल जाता है।

यह निष्कर्ष पांच महानगरों सहित दस शहरों में किए गए सर्वेक्षण के आधार पर निकाला गया है। वैसे ये बात आम अनुभव का हिस्सा है। अगर आपकी अधिकारियों तक पहुंच हो या दलालों को पैसा देने को आप तैयार हों, तो बिना ड्राइविंग टेस्ट दिए आप आसानी से लाइसेंस हासिल कर सकते हैं। बायो-मेट्रिक सिस्टम लागू होने के बाद फोटो खिंचवाने के लिए एक बार आरटीओ जाने की मजबूरी जरूर हो गई है, लेकिन इससे यह सुनिश्चित नहीं हुआ है कि ठोक-बजा कर ही लाइसेंस दिया जाएगा। कुछ साल पहले तो बिना आरटीओ गए भी लाइसेंस मिल जाते थे। अब जिसे ड्राइविंग के मूलभूत नियम ना पता हों और जो ट्रैफिक संकेतों को ना जानता-समझता हो, उससे आप कैसी ड्राइविंग की आशा कर सकते हैं? सर्वे रिपोर्ट से सामने आई हकीकत पर ध्यान दीजिए। आगरा में सामने आया कि वहां सिर्फ 12 फीसदी ड्राइवरों ने ईमानदार तरीके से लाइसेंस हासिल किया था।

बाकी 88 प्रतिशत ने माना कि उन्होंने ड्राइविंग टेस्ट नहीं दिए। जयपुर में ये संख्या 72 फीसदी थी, तो दिल्ली में 54 और मुंबई में 50 प्रतिशत ड्राइवरों ने ये हकीकत मानी। ये सर्वे रिपोर्ट उस समय आई है, जब संसद नए मोटर वाहन विधेयक पर विचार कर रही है। प्रस्तावित कानून में सूचना तकनीक आधारित ड्राइविंग टेस्ट का प्रावधान है। नियमों के उल्लंघन पर सख्त दंड की व्यवस्था भी इसमें है। ये अच्छी बातें हैं, लेकिन क्या इन पर अमल कराना संभव होगा? भ्रष्टाचार अपने देश में कितने गहरे तक पसरी हुई समस्या है, यह जानना हो तो आपको एक बार किसी आरटीओ का दौरा जरूर करना चाहिए। जब तक इसकी जड़ें वहां सिंच रही हैं, तमाम कानूनी प्रावधान बेअसर बने रहेंगे।

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