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तीखे होते सामाजिक अंतर्विरोध

मुंबई की सड़कों पर लाखों मराठा उतरे। सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण की उनकी मांग अब पुरानी हो चुकी है। लेकिन गुजरते समय के साथ उनकी मांगें बस वहीं तक सीमित नहीं रही हैं। अब उन्होंने किसानों की पूर्ण कर्ज माफी की मांग भी उठाई है। इन मांगों को मानना अपने-आप में कठिन है। मगर इसके साथ एक और ऐसी मांग मराठा समुदाय ने की है, जिसका सामना करना महाराष्ट्र या केंद्र सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है। मांग है अनुसूचित जाति-जन जाति अत्याचार निवारण कानून को बदला जाए। जिस वक्त भारतीय जनता पार्टी दलित वर्ग को अपना खास वोट बैंक बनाने की कोशिश में जुटी है, क्या इस मांग पर वह कोई सकारात्मक संकेत देने की स्थिति में भी है? दरअसल, ये मांग समाज में तीखे होते सामूहिक अंतर्विरोधों को परिलक्षित करती है। ऐसी स्थितियों का समाधान महज सरकारी फैसलों से नहीं हो सकता।

इसके लिए व्यापक सामाजिक दृष्टि के साथ आम-सहमति बनाने की जरूरत पड़ती है। मगर फिलहाल देश में सहमतियां टूटने का दौर है। बहरहाल, मराठा समुदाय की मांगों पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कुछ एलान किए। आरक्षण की मांग को तो उन्होंने सीधे नहीं माना, लेकिन उस दिशा में आगे बढ़ने का वादा किया। कहा कि मराठा आरक्षण की मांग को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को भेज दिया गया है। आयोग मराठों को आरक्षण देने के आधार और संभावनाओं का अध्ययन करेगा। इसके अलावा मराठा समुदाय के बच्चों को शिक्षा में वे सारी सुविधाएं और छूट दी जाएंगी, जो अभी ओबीसी छात्रों को मिल रही है। हर जिले में मराठा छात्रों के लिए हॉस्टल बनाया जाएगा। एससी-एसटी कानून से मराठों की आपत्ति के मद्देनजर मुख्यमंत्री ने कहा कि कोपर्डी गैंगरेप केस को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।

पिछले साल अहमदनगर जिले के कोपर्डी में एक नाबालिग मराठा बालिका की गैंगरेप के बाद हत्या कर दी गई थी। इस कांड के आरोपी दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। इस कांड के बाद मराठों दलितों के प्रति भी आक्रोश बढ़ा। मगर अब उनकी मांग केस को तेजी से आगे बढ़ाने भर की नहीं है। बल्कि वे कानून में बदलाव चाहते हैं, जिस पर मुख्यमंत्री चुप रहे। गहराई से देखें तो शिक्षा क्षेत्र के बारे में घोषित उपायों के अलावा मुख्यमंत्री के बाकी एलान टाल-मटोल वाले हैं। इनसे मराठों का आक्रोश दूर होगा, ये कहना कठिन है।

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