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साहसी, मगर कितना उपयोगी?

बेशक केंद्र सरकार ने साहसी कदम उठाया है। लेकिन इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को सचमुच कितना लाभ होगा, इस प्रश्न पर संदेह वाजिब कारण हैं। नरेंद्र मोदी सरकार विदेशी निवेश को लाना चाहती है, इस बारे में किसी को पहले से भी कोई भ्रम नहीं था। दरअसल, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने की मोदी सरकार की नीति पहले भी काफी सफल रही है। 2013-14 में 36.05 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आय़ा था, जो 2016-17 में 60.08 अरब डॉलर तक पहुंच गया। लेकिन कड़वा सच यह है कि इसके बावजूद आज भारतीय अर्थव्यवस्था चमकती नहीं दिखती। हर आर्थिक संकेतक चिंता पैदा करने वाला है। खुद भारतीय सांख्यिकी संगठन और भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े कठिन आर्थिक परिस्थितियों की झलक दिखाते हैं।

ऐसे में सिंगल ब्रांड रिटेल में ऑटोमैटिक रूट से 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देना या एयर इंडिया में 49 फीसदी तक हिस्सेदारी खरीदने के लिए विदेशी कंपनियों को हरी झंडी देने से वास्तविक अर्थव्यवस्था कितनी लाभान्वित होगी, कहना कठिन है। बेशक अब एनडीए सरकार ने फिर निवेशकों के अनुकूल निर्णय लिया है। दुनिया भर के निवेशकों को सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की है। ये कदम उस समय उठाया गया है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्विट्जरलैंड के शहर दावोस में होने वाली वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सालाना बैठक में जाने की तैयारी में हैं। प्रधानमंत्री वहां 23 जनवरी को दुनिया की मशहूर कंपनियों के प्रमुखों को संबोधित करेंगे। ताजा फैसलों से सरकार को अपेक्षा होगी कि वो कंपनियां भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में कही गई मोदी की बातों को अधिक गंभीरता से लेंगी। मगर मुश्किल यह है कि इन दिनों अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की आर्थिक दिक्कतों की कहानियां ज्यादा प्रकाशित हो रही हैं। जाहिर है, कंपनी अधिकारियों की नजर उन पर भी होगी। बहरहाल, ये फैसला इसलिए साहसी है, क्योंकि एक बार फिर सरकार भारतीय व्यापारियों की मांगों के खिलाफ गई है।  

व्यापारी समुदाय रिटेल क्षेत्र में विदेशी निवेश के खिलाफ रहा है। यह मोदी की खासियत है कि जीएसटी, नोटबंदी, विदेशी निवेश आदि जैसे फैसलों के बावजूद भारतीय कारोबारी समुदाय को अपने पक्ष में बनाए रखने में वे सफल रहे हैं। इसलिए ताजा निर्णयों का भले व्यापारियों के संगठन ने विरोध किया हो, लेकिन उससे सत्ताधारी दल को कोई खास चिंता शायद नहीं होगी। बहरहाल, इस फैसले एयर इंडिया का कुछ भला हुआ, तो वह अच्छी बात होगी। अब देखना है कि क्या सचमुच ऐसा हो पाता है।  

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