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उदार नजरिए की जरूरत

संपादकीय-2
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क्या‍ किसी व्यक्ति को ये अधिकार दिया जा सकता है कि वह यह कह सके कि लंबी बेहोशी (कोमा) की हालत में पहुंचने पर उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम के जरिए जिंदा न रखा जाए? सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस सवाल पर सुनवाई शुरू की है। एक एनजीओ ने कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जिस तरह नागरिकों को जीने का अधिकार है, उसी तरह उन्हें मरने का भी हक है। इस एनजीओ का कहना है कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को 'लिविंग विल' यानी जीवित रहते हुए अपनी वसीयत बनाने का हक होना चाहिए। 'लिविंग विल' के माध्यम से संबंधित व्यक्ति यह बता सकेगा कि जब वह ऐसी स्थिति में पहुंच जाए, जहां उसके ठीक होने की उम्मीद न हो, तब उसे जबरन लाइफ सपॉर्ट सिस्टम पर न रखा जाए। याचिकाकर्ता का कहना है कि वह सक्रिय इच्छा-मृत्यु (ऐक्टिव यूथनेशिया) की वकालत नहीं कर रहा है।

इस ढंग की इच्छा-मृत्यु में लाइलाज मरीज को इंजेक्शन दे कर मारा जाता है। कॉमन कॉज के मुताबिक वह पैसिव यूथनेशिया के अधिकार की मांग कर रहा है। इस ढंग की इचछा-मृत्यु में कोमा में पड़े लाइलाज मरीज से वेंटिलेटर जैसे लाइफ सपॉर्ट सिस्टम को हटा कर उसे मरने दिया जाता है।

लेकिन केंद्र सरकार ने पैसिव यूथनेशिया का विरोध किया है। केंद्र ने कोर्ट में कहा कि इच्छा-मृत्यु की वसीयत लिखने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इसका दुरुपयोग हो सकता है। अपने देश में- जहां आम नागरिक वित्तीय एवं शैक्षिक रूप से सशक्त नहीं है और जहां इलाज एक बेहद महंगी व्यवस्था है, वहां दबाव में या गुमराह कर लिविंग विल लिखवाए जा सकते हैं। इस आशंका को दरकिनार नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद जहां डॉक्टर जवाब दे चुके हों, उन मामलों के लिए कोई उदार व्यवस्था अस्तित्व में आए, यह वांछित है। आशा है कि संविधान पीठ के फैसले से ऐसा संभव हो सकेगा।

कोर्ट ने कुछ वाजिब सवाल उठाए हैं। मसलन, क्या किसी व्यक्ति को उसकी मर्जी के खिलाफ कृत्रिम सपॉर्ट सिस्टम पर जीने के लिए मजूबर किया जा सकता है? जब सम्मान से जीने को अधिकार माना जाता है, तो क्यों न सम्मान के साथ मरने को भी अधिकार माना जाए? क्या इच्छा मृत्यु मौलिक अधिकार के दायरे में आती है? इन प्रश्नों के क्या जवाब उभरते हैं, इन्हें जानने पर सारे देश का ध्यान लगा रहेगा।

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