अब कठघरे में एनकाउंटर्स

उत्तर प्रदेश की बहुचर्चित मुठभेड़ों का मामला अब न्यायिक जांच के दायरे में आ गया है। उच्चतम न्यायालय उत्तर प्रदेश को इस बारे में नोटिस जारी किया है। कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें कथित मुठभेड़ों की अदालत की निगरानी में सीबीआई या विशेष जांच दल से जांच कराने की गुजारिश की गई है। अदालत इस याचिका पर विस्तार से सुनवाई के लिये सहमत हो गया है। याचिका पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) ने याचिका दायर की है। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस संजय किशन कौल की पीठ ने रिकॉर्ड में उपलब्ध सामग्री पर गौर करने के बाद कहा कि पीयूसीएल संगठन की याचिका में उठाए गए मुद्दों पर गंभीरता से विचार की आवश्यकता है। पीठ इस मामले पर 12 फरवरी को सुनवाई करेगी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि 2017 में करीब 1100 मुठभेड़ें हुईं, जिनमें 49 व्यक्ति मारे गए और 370 अन्य जख़्मी हुए। याचिका में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और अतिरिक्त पुलिस महानिरीक्षक (कानून व्यवस्था) आनंद कुमार के हवाले से प्रकाशित ख़बरों का जिक्र है।

उन बयानों में राज्य में अपराधियों को मारने के लिए मुठभेड़ों को न्यायोचित ठहराया गया था। गौरतलब है कि राज्य सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को उपलब्ध कराए गए आंकड़ों में बताया था कि एक जनवरी 2017 से 31 मार्च 2018 के दौरान 45 व्यक्ति मारे गए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफ़नामे में योगी सरकार ने बताया है कि उत्तर प्रदेश में बदमाशों के साथ हुई मुठभेड़ में चार पुलिसकर्मियों की मौत हुई है। मारे गए बदमाशों में 30 बहुसंख्यक समुदाय के थे। जबकि 18 बदमाश अल्पसंख्यक समुदाय से। सरकार ने कोर्ट को बताया था कि इस दौरान 98,526 अपराधियों ने सरेंडर भी किया है, जबकि 3,19,141 अपराधी गिरफ्तार किए गए। इन मुठभेड़ों के दौरान 319 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, जबकि 409 अपराधी भी जख़्मी हुए। मगर इन आंकड़ों पर कई हलकों से सवाल उठाए गए हैँ। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने भी भारत सरकार को उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा न्यायिक हिरासत में हत्याओं के 15 मामलों की जानकारी के साथ पत्र लिखा है। उन्होंने संभावित 59 फर्जी एनकाउंटर्स का भी संज्ञान लिया है। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने इस पूरे मामले को बेहद चिंता का विषय बताया है। ऐसी चिंताएं देश के अंदर भी जताई जाती रही हैं। ऐसे में यह संतोष की बात है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इनका संज्ञान ले लिया है।

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