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ऐसा भी क्या ‘हिंदी-प्रेम’!

मौका संगीत में सराबोर होने का था, लेकिन यह हिंदी बनाम अहिंदी विवाद में तब्दील हो गया। लंदन में हुए एक संगीत समारोह में ऑस्कर पुरस्कार विजेता संगीतकार एआर रहमान ने तमिल में गाना शुरू किया, तो दर्शक उठकर बाहर जाने लगे। तब से सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी हुई कि कौन है और कौन असहिष्णु। रहमान ने अपने लोकप्रिय तमिल गानों को वहां गाया। इससे बहुत से लोग नाराज हो गए। वो अपने टिकट का पैसा वापस मांगने लगे। जबकि इस कंसर्ट का नाम ही तमिल में थाः 'नेत्रु इंदु नालई'- यानी 'कल आज कल।' मगर इस पर गौर करने की किसी को फुर्सत नहीं थी। फिर रहमान ने 28 गाने गाए, जिनमें 16 हिंदी के थे। जब तमिलभाषियों ने 16 हिंदी गाने सुने, तो हिंदीभाषियों के लिए 12 तमिल गानों का सुन लेना ऐसा मसला नहीं था, जिस पर विवाद खड़ा किया जाता। लेकिन विवाद भड़का।

सोशल मीडिया पर तमिलभाषियों का आक्रोश जाहिर हुआ। एक टिप्पणी में लिखा गया- ‘आधा भारत इतना असहिष्णु है कि दूसरी भाषा नहीं भी सुन सकता... और वे हमसे उम्मीद करते हैं कि हम ज़िंदगी भर हिंदी बोलें!’ ऐसी टिप्पणयां भी की गईं कि हिंदीभाषियों को समझना चाहिए कि जब वे ‘हिंदी थोपते हैं तो ऐसा ही हमें भी महसूस होता है।’ तमिलनाडु में हिंदी विरोधी भावनाएं लगभग पांच दशक पुरानी हैं। तब चले हिंदी विरोधी आंदोलन का असर अभी भी है। वहां डीएमके और एआईएडीएमके में बहुत सारे मुद्दों पर गहरे मतभेद हैं, लेकिन जब बात हिंदी की आती है, तो दोनों ही पार्टियों का रुख एक जैसा हो जाता है। कई दूसरे राज्यों में ये विरोध भले इतना तीखा ना हो, लेकिन वहां भी ऐसी भावनाएं जब-तब उभरती रहती हैं। अभी हाल में बंगलुरू में मेट्रो स्टेशनों के नाम हिंदी में लिखे जाने के खिलाफ अभियान चला।

उस आंदोलन से जुड़े लोगों ने कहा कि हिंदी अन्य भारतीय भाषाओं की तरह ही है, इसलिए इसे ऐसे शहरों पर थोपा नहीं जा सकता जहां बहुसंख्यक तमिल, तेलुगू या कन्नड़ भाषा बोलते हैं। हिंदीभाषियों के लिए बेहतर होगा कि वे ऐसी भावनाओं पर गौर करें। दूसरी भारतीय भाषाओं के प्रति असहिष्णुता दिखाने से हिंदी को अखिल भारतीय स्तर तक फैलाने के उद्देश्य में रुकावट आती है। इससे कोई नुकसान नहीं होता, अगर लंदन में हिंदी भाषी 12 तमिल गाने शांति से सुन लेते। ऐसा नहीं करके उन्होंने एक अनावश्यक मुद्दा खड़ा किया।

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