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पारदर्शिता का पक्ष लीजिए

संपादकीय-2
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केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के सुप्रीम कोर्ट में पेश ब्योरे से संकेत मिला कि जन प्रतिनिधियों की आमदनी पर निगरानी का सवाल कम-से-कम एक कदम आगे बढ़ा है। सीबीडीटी ने सोमवार को कोर्ट को बताया कि सात लोकसभा सांसदों और देशभर के 98 विधायकों की संपत्तियों में बहुत तेजी से इजाफा हुआ है। इसमें अनियमितताएं पाई गई हैं। सीबीडीटी ने कहा कि वह मामले की आगे जांच करेगा। लेकिन बोर्ड ने उन नेताओं के नामों का खुलासा करने से इनकार किया है। कहा कि अदालत इन मामलों का संज्ञान ले सके, इस मकसद से संबंधित जानकारियों को सीलबंद लिफाफे में उसे सौंपा जाएगा। ये मामला एक गैर-सरकारी संगठन की याचिका से सुप्रीम कोर्ट में आया है। लोक प्रहरी नामक इस एनजीओ ने ध्यान दिलाया कि चुनाव जीतने के बाद कई जन-प्रतिनिधियों की संपत्ति में 500 फीसदी से भी ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। इस संस्था की मांग है कि अब चुनाव मैदान में उतरे उम्मीदवारों के लिए अपने आय के स्रोतों को सार्वजनिक करना भी अनिवार्य कर दिया जाए। अभी चुनाव लड़ने के लिए परचा दाखिल करते समय संपत्ति का ब्योरा तो देना पड़ता है, लेकिन आय का स्रोत बताने का प्रावधान नहीं है। इससे पता नहीं चल पाता कि जन-प्रतिनिधि रहते हुए व्यक्ति ने जो धन कमाया, वह वैध स्रोतों से आया या संदिग्ध स्रोतों से। 

सीबीडीटी ने सात लोकसभा सदस्यों और 98 विधायकों के मामलों में गड़बड़ियां पाई हें। जबकि लोक प्रहरी ने ढाई सौ से ज्यादा सांसदों और विधायकों की संपत्ति के स्रोतों पर शक जताया था। इस एनजीओ का कहना है कि उसने इन नेताओं के दाखिल चुनावी हलफनामों का अध्ययन किया गया है। अब सीबीडीटी के जवाब से साफ है कि एनजीओ का शक पूरी तरह निराधार नहीं था। नेताओं की दलील रही है कि उनकी संपत्ति में जो वृद्धि बताई जाती है, अक्सर उससे सही तस्वीर सामने नहीं आती। पुराने जायदाद या निवेश का मूल्य बढ़ने से बढ़ी संपत्ति को भी इस रूप में पेश किया जाता है, जैसेकि उन्होंने भ्रष्टाचार किया हो। यह तर्क पूरी तरह निराधार नहीं है। मगर इसका संकेत है कि आय के स्रोत का कॉलम जोड़ना खुद जन-प्रतनिधिनियों के हित में है। जब पूरी जानकारी आएगी, तो संदेह की गुंजाइश नहीं रहेगी। तो सरकार और राजनीतिक दल खुद कोर्ट में जाकर क्यों एनजीओ की मांग का समर्थन नहीं करते? जब तक वे इसमें हिचक दिखाएंगे, वे संदेह का आधार मुहैया कराते रहेंगे।  

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