आरक्षण की मुश्किल राह

गुजरात में पाटीदार समुदाय को आरक्षण दिलाने के लिए उपवास पर बैठे हार्दिक पटेल ने 18 दिन बाद अपना अनशन तोड़ा, लेकिन आरक्षण की उनकी मांग को मानना तो दूर राज्यसरकार का कोई प्रतिनिधि हाल-चाल लेने भी नहीं पहुंचा। इसकी वजह यह भी हो सकती है कि हार्दिक पटेल अक्सर सरकार के खिलाफ बोलते रहे हैं। लेकिन यह बात भी उतनी ही सही है कि आरक्षण की उनकी मांग को मान लेना आसान नहीं है।पाटीदार समुदाय को आरक्षण दिलाने को लेकर हार्दिक पटेल पहले भी गुजरात में आंदोलन कर चुके हैं। दरअसल, हार्दिक पटेल का आंदोलनआरक्षण को लेकर चल रहे उन्हीं आंदोलन की शृंखला की एक कड़ी है, जो बीते कई सालों से देश के अलग-अलग हिस्सों में चली आ रही है।गुजरात में पटेल समुदाय, राजस्थान में गुर्जर समुदाय, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में जाट समुदाय, आंध्र प्रदेश का कापूजैसे कई समुदाय और कितनी जातियां आरक्षण पाने के लिए लाइन में खड़ी हैं। उधर कथित सवर्ण जातियांअब आरक्षण के स्वरूप को ही बदलकर आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग कर रही हैं। इसके पीछे कारण कहीं गहरा है। भारत में निजी क्षेत्र के इतने विकास के बावजूद आज भी सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र सरकारी क्षेत्र ही है, जहां करोड़ों लोग या तो सीधे तौर पर नौकरी कर रहे हैं। इसके अलावा सरकारी नौकरी अभी भी कई मायनों में निजी क्षेत्र की तुलना में बेहतर समझी जाती है, चाहे स्थायित्व की बात हो या फिर रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सुविधाओं का मुद्दा हो। ये अलग बात है कि पिछले करीब एक दशक से रिटायरमेंट के बाद पेंशन सुविधा खत्म कर दी गई है। बावजूद इसके,सरकारी नौकरी के प्रति लोगों का आकर्षण कायम है।नई पेंशन योजना के तहत कर्मचारियों के वेतन और डीए की दस फीसदी धनराशि की कटौती की जा रही है।उदारीकरण के बाद से आबादी के अनुपात में इनकी संख्या में काफी कमी भी आई है। देश के कई राज्यों में आरक्षण को लेकर अलग अलग समुदायों की तरफ से मांग उठती रही है। हमेशा सरकारें या राजनीतिक दल इन मांगों को पूरा करने के नाम पर कुछ न कुछ वादे भी करते रहे हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक कोई भी राज्य 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दे सकता।हार्दिक पटेल को राज्य सरकार द्वारा नजरअंदाज करने के पीछे यह कारण भी हो सकता है।

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