भारतीय फुटबॉल में उम्मीदें

संपादकीय-2
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एशिया कप फुटब़ॉल में बहरीन से हारने के साथ ही भारत टूर्नामेंट से बाहर हो गया। उसके बाद भारतीय टीम के कोच स्टीफन कॉन्सटेंटाइन ने अपना पद छोड़ने का एलान किया। लेकिन कॉन्सटेंटाइन का भारतीय फुटबॉल में अहम योगदान रहा है। भारत इस टूर्नामेंट के लिए क्वालीफाई कर पाया, तो इसका काफी श्रेय उन्हें जाता है। वैसे यूएई में चल रहे टूर्नामेंट में यही जाहिर हुआ कि फुटबॉल की दुनिया में भारत का स्तर अब भी लचर है। यूएई के आरंभिक मैच में थाईलैंड को 4-1 से हराकर भारत ने सबको चौंका दिया था। बीते 50 सालों में इस टूर्नामेंट में यह भारत की पहली जीत थी। इसके बाद मेजबान टीम यूएई के हाथों 2-0 से हारने के बाद भी कोच स्टीफन कॉन्सटेंटाइन ने कहा कि कि भारतीय फुटबॉल से उम्मीदें जुड़ी हैं। उन्होंने कहा- "भारतीयों को क्रिकेट से प्यार तो है ही लेकिन अब आप फुटबॉल को लेकर यह कायापलट होते देख रहे हैं। ऐसा होता देख कर वाकई गर्व होता है।" बेशक टीम का एशिया कप के लिए क्वालीफाई करना, फिर पहले दो मैचों में अच्छा प्रदर्शन करना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं माना जाना चाहिए। ब्लू टाइगर्स कहे जाने वाले भारतीय फुटबॉल टीम के खिलाड़ियों में अनुभवी स्ट्राइकर सुनील छेत्री के नाम अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल में दागे गए गोलों का एक प्रभावशाली रिकॉर्ड दर्ज हुआ है। थाईलैंड से खेले गए मैच में गोल दागने के बाद छेत्री गोलों की संख्या के हिसाब से अर्जेंटीना के स्ट्राइकर लियोनेल मेसी से भी आगे निकल गए।

टॉप पर 85 गोलों के साथ रोनाल्डो हैं और छेत्री के नाम 67 गोल हैं। हालांकि जैसी दमदार टीमों के सामने मेसी ने अपने गोल जड़े हैं। इसलिए उनसे छेत्री के गोलों की तुलना करना उचित नहीं है। खुद छेत्री ने कहा भी कहा है कि मेसी, रोनाल्डो से उनकी कोई तुलना ही नहीं हो सकती। बहरहाल, चार साल पहले भारतीय टीम के कोच की जिम्मेदारी संभालने वाले कॉन्सटेंटाइन ने ऐसी ही भूमिका में मलावी, सूडान और रवांडा की टीमों के साथ रहते हुए हिंसा, संघर्ष, खून खराबा और हर तरह का मानवीय कष्ट करीब से देखा है। सन 2013 से भारत में चल रही इंडियन सुपर लीग ने भी देश में फुटबॉल को थोड़ा लोकप्रिय बनाया है। वैसे 1.3 अरब की आबादी वाला देश भारत अब भी दुनिया के फुटबॉल के मानचित्र पर अपनी छाप नहीं छोड़ पाया है। क्या अब ऐसा होगा, यही सवाल आज सबसे अहम है।

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