एक नया चिपको आंदोलन

संपादकीय-2
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यह एक नए तरह का चिपको आंदोलन है। 1970-80 के दशक में उत्तराखंड का चिपको आंदोलन दुनिया भर में मशहूर हुआ था। अब वैसा नजारा ओडीशा में देखने को मिल रहा है। वहां पेड़ों को कटने से रोकने के लिए महिलाओं के चिपको आंदोलन के कारण नवीन पटनायक सरकार को अपना फैसला बदलने पर मजबूर होना पड़ा। सरकार ने एक बीयर बॉटलिंग संयंत्र को जमीन देने के लिए झिंकारगड़ी जंगल में पेड़ों की कटाई का आदेश दिया था। लेकिन इलाके के 13 गांवों की महिलाओं ने सत्तर के दशक के चिपको आंदोलन को साकार करते हुए सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। अंततः सरकार ने फिलहाल पेड़ों की कटाई पर रोक लगाई। जानकारों का कहना है कि संभवतः मुख्यमंत्री को अंधेरे में रख कर स्थानीय प्रशासन ने पेड़ों की कटाई का फैसला किया था।

नवीन पटनायक सरकार ने कोलकाता के एक कारोबारी समूह को बीयर फैक्टरी के बॉटलिंग प्लांट के लिए इलाके में 12 एकड़ जमीन लीज पर दी थी। इस परियोजना पर 102 करोड़ की लागत आनी थी। लेकिन उस जमीन में से पांच एकड़ पर साल के पेड़ लगे थे। लीज की शर्तों के मुताबिक सरकार ने जिला प्रशासन को साल के पेड़ों को काटने का आदेश दिया था। दिलचस्प यह है कि पटनायक ने खुद ही सात नवंबर को वीडियो कांफ्रेंसिग के जरिए उस परियोजना का शिलान्यास किया था। इसका निर्माण कार्य आठ नवंबर को ही शुरू होना था। लेकिन पेड़ों की कटाई की खबर फैलते ही बलरामपुर इलाके के 13 गांवों की महिलाएं मौके पर पहुंच गईं। वह तमाम पेड़ों से चिपक गईं। नतीजतन पेड़ काटने के लिए मौके पर पहुंचे लोगों को कामयाबी नहीं मिली। एक सप्ताह से जारी इस आंदोलन के बाद शनिवार को पुलिस व सुरक्षा बलों ने पेड़ों से चिपकी महिलाओं को जबरन मौके से हटाया। गांव वालों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों के बाद मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने जिले में पेड़ों की कटाई तत्काल रोकने का निर्देश देते हुए राजस्व आयुक्त से इस मामले की जांच करने को कहा है। महिलाओं का कहना है- हम चार दशकों से भी ज्यादा समय से इस जंगल की हिफाजत करते आ रहे हैं। यह जंगल हमारी मेहनत का नतीजा है। हम इसे कैसे कटने दे सकते हैं? उनका कहना है कि चाहे उनकी जान चली जाए, लेकिन इस जंगल को कटने नहीं देंगी। फिलहाल इसमें उन्हें सफलता मिली है। इससे चिपको आंदोलन के एक नए संस्करण के रूप में देखा जा रहा है।

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