पर कतर तो बेफिक्र है!

संपादकीय-2
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2022 के फुटबॉल वर्ल्ड कप का फाइनल कतर के लुसैल शहर में होगा। शहर को चमकाने के लिए कतर 45 अरब डॉलर खर्च कर रहा है। लेकिन इस खर्चे में से कई मजदूरों को कुछ भी नहीं मिला है। मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक कतर ने कम-से-कम 78 विदेशी मजदूरों को फरवरी 2016 से तनख्वाह नहीं दी है। पैसे के अभाव में इन मजदूरों ने पैसा उधार लिया और अब हर एक पर औसतन दो हजार डॉलर का कर्ज चढ़ा हुआ है। यह उनकी कई महीनों की तनख्वाह के बराबर है। 20 महीने से तनख्वाह के लिए तरसने वालों में नेपाल, भारत और फिलीपींस के मजदूर हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक मर्करी मीना नाम की एक ठेका कंपनी ने मजदूरों को हजारों डॉलर की मजदूरी और काम से जुड़े फायदे नहीं दिए, उन्हें असहाय और कौड़ी का मोहताज बना दिया। कतर पर मजदूरों के शोषण के आरोप पहले भी लगते रहे हैं, लेकिन इस पैमाने पर तनख्वाह को रोके रखने का आरोप पहली बार सामने आया है। एमनेस्टी के आरोप के बाद फीफा से भी सवाल पूछे जा रहे हैं। फीफा ने एमनेस्टी पर गुमराह करने का आरोप लगाया है। फीफा के प्रवक्ता ने कहा कि तनख्वाह न पाने वाले मजदूर 2022 के वर्ल्ड कप से नहीं जुड़े हैं।

मगर काम करने वाले मजदूरों ने एमनेस्टी को बताया कि वे बीते दो साल से कतर में काम कर रहे हैं और बुरी तरह कर्ज में डूबे हैं। नेपाल से आए कुछ मजदूरों के मुताबिक घर पैसा भेजने के बजाए, उन्हें घर से पैसा मंगाना पड़ा, नेपाल में जमीन बेचनी पड़ी और बच्चों का स्कूल तक बंद करना पड़ा। एमनेस्टी के मुताबिक मर्करी मीना ने कतर के कफाला सिस्टम का फायदा उठाया। इस सिस्टम के तहत कामगारों को नौकरी बदलने या देश छोड़ने के लिए अपने बॉस की अनुमति लेनी पड़ती है। एमनेस्टी इंटरनेशनल का दावा है कि तनख्वाह न मिलने से परेशान कुछ मजदूरों ने अपने देश वापस लौटने की इच्छा जताई, तो उनसे कहा गया कि वापसी का खर्च उन्हें खुद उठाना होगा।

कतर को 2010 में फीफा ने वर्ल्ड कप की मेजबानी सौंपी है। कतर पर मेजबानी पाने के लिए कई हथकंडे अपनाने का आरोप भी हैं। खोजी पत्रकारों के मुताबिक कतर ने मेजबानी की दौड़ में शामिल दूसरे देशों को बदनाम करने के लिए मीडिया में नेगेटिव रिपोर्टें भी प्रकाशित करवाईं। इसके बावजूद कतर की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। 

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