वापस भेजे जाएंगे रोहिंग्या?

संपादकीय-2
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फिलहाल एक अजीब विडंबना है। इस वक्त जितने रोहिंग्या मुस्लिम म्यांमार में हैं, उनकी उससे अधिक संख्या बांग्लादेश में है। अब वहां से रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस म्यांमार भेजने की तैयारी शुरू हो गई है। बांग्लादेश के शरणार्थी राहत और वापसी आयोग ने कहा है कि शरणार्थियों से कोई जबरदस्ती नहीं होगी। शरणार्थियों को तभी ट्रांजिट कैंपों में ले जाया जाएगा, जब वे इसके लिए राजी होंगे। तो अब यह महत्त्वपूर्ण पहलू होगा कि कितने शरणार्थी अपनी मर्जी से बांग्लादेश को छोड़ कर वापस म्यांमार जाने को इच्छुक हैं। वैसे बांग्लादेश पहली खेप में ढाई हजार से ज्यादा शरणार्थियों को वापस भेजने की तैयारी कर रहा है। जबकि संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि म्यांमार में हालात सुधरने तक शरणार्थियों को वापस ना भेजा जाए।

म्यांमार के पश्चिमी रखाइन प्रांत में अगस्त 2017 में सेना की कार्रवाई से बचने के लिए लगभग सात लाख से ज्यादा रोहिंग्या लोग भागकर दक्षिणी बांग्लादेश के कॉक्स बाजार जिले में चले आए। म्यांमार की सेना की कार्रवाई में कितने लोग मारे गए, इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। वैसे संयुक्त राष्ट्र ने इसे 'जातीय सफाए की मिसाल' करार दिया था। बांग्लादेश में रह रहे बहुत से शरणार्थियों का कहना है कि उनका दमन किया गया, उनके घरों को जला दिया गया और उनके परिवार की महिलाओं के साथ म्यांमार के सैनिकों और बहुसंख्यक बौद्ध उपद्रवियों ने बलात्कार किए। बांग्लादेश और म्यांमार ने नवंबर 2017 में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें शरणार्थियों की वापसी की बात शामिल है।

इसके तहत नवंबर 2018 के मध्य में यह वापसी शुरू होनी थी। लेकिन रोहिंग्या समुदाय के लोगों का कहना है कि जिन लोगों की वापस भेजने के लिए पहचान की गई है, उनमें से ज्यादा कॉक्स बाजार के कैंप में छिप गए हैं। इसलिए यह साफ नहीं है कि कितने लोग सचमुच वापस भेजे जा सकेंगे। समुदाय के नेताओं का कहना है कि इस लिस्ट में जिन परिवारों के नाम हैं, उनमें से 98 फीसदी भाग गए हैं। रोहिंग्या समुदाय के लोगों का कहना है कि कुछ दिनों से कॉक्स बाजार के कैंप में सैनिकों की बढ़ती मौजदूगी से लोगों में चिंता है। इस बीच मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी बांग्लादेश और म्यांमार से अपील की है कि वे शरणार्थियों की वापसी की अपनी योजनाओं को 'तुरंत रोक दें'। इससे वापस जाने वाले लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ेगी। लेकिन बांग्लादेश की अपनी मजबूरियां हैं और वह अधिक समय तक शरणार्थियों का बोझ उठाने को तैयार नहीं है। 

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