कानून बनाम आस्था

संपादकीय-2
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सबरीमाला में पिछले पांच दिन से चल रहा घटनाक्रम यह बताने के लिए काफी है कि अगर कानून सामाजिक और आस्था से जुड़े मामलों में अतिवादी दखल देता है तो उसका क्या हश्र होता है। सबरीमाला में प्रतिबंधित आयुवर्ग की महिलाओं के प्रवेश को लेकर कानून धरा का धरा रह गया और एक भी महिला अब तक भगवान अयप्पा के दर्शन करने मंदिर में नहीं जा पाई। इसकी सबसे बड़ी और मूल वजह यही है कि अदालत ने हकीकत को नहीं समझा और आस्था में लैंगिक समानता को खोजते हुए कानूनी नजरिए से अपना फरमान सुनाया। मुद्दे की बात यह है कि सबरीमाला मंदिर में खास आयुवर्ग की महिलाओं को प्रवेश नहीं देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। वह एक मान्य परंपरा है, जो समाज के मानस में आज भी वैसे ही पैठी है जैसे हर धर्म और समाज में उसकी अपनी आस्थाएं और मान्यताएं पैठी होती हैं। और यह फैसला देने वाली अदालतें भी भलीभांति समझती हैं कि सदियों से चली आ रही परंपराओं, मान्यताओं को कानून के सहारे नहीं तोड़ा जा सकता। जब आस्था का सवाल आता है तो कानून उसके सामने हमेशा बौना पड़ता है। 

हालांकि कानून अपनी जगह है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना उसका कर्तव्य है, लेकिन ऐसे संवेदनशील मामलों में व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत होती है। कानून सदियों से चली आ रही परंपराओं को एक दिन में या कुछ सालों में नहीं तोड़ सकता। दुनिया के हर मुल्क में दर धर्म के अपने रीति-रिवाज हैं, उसे मानने के अपने नियम हैं और ऐसी परंपराओं और आस्थाओं से लाखों-करोड़ों लोग जुड़े होते हैं। इसलिए धार्मिक और आस्था से जुड़े मामलों में अदालती फैसले कई बार गंभीर और अनावश्यक विवाद का रूप ले लेते हैं। जिस तरह सामाजिक कार्यकर्ता रेहाना फातिम ने मंदिर में घुसने की कोशिश की, उसे कैसे उचित ठहराया जा सकता है?  क्या रेहाना मुसलिम महिलाओं को भी मस्जिद में जाने का बराबरी का हक दिलवाने के लिए अदालती लड़ाई लड़ सकती हैं? क्या गुरुद्वारे में बिना सिर ढके जाया जा सकता है? धार्मिक मान्यताओं और नियमो वाले क्या ऐसे मामले अदालत सुलझा सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने जो सबरीमाला में जो फैसला दिया है, उसका सम्मान करते हुए उसे लागू कराने के दूसरे विकल्पों पर विचार करना बेहतर होगा, बजाय इसके कि मंदिर में प्रवेश को लेकर आज जिस तरह के हालात बनवाए जा रहे हैं।

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