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फिर कट्टरपंथ की राह?

क्‍या शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी फिर मजहबी कट्टरपंथ की राह पर है? सिख पंथ को इस राह पर ले जाने की कोशिशों की तीन दशक पहले पंजाब बहुत महंगी और दुखद कीमत चुकाई थी। असहिष्णुता कट्टरपंथ की पहली निशानी होती है। ताजा मामले में कमेटी ने परले दर्जे की असहिष्णुता दिखाई है। उसने वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर को दिया सम्मान वापस लेने का फ़ैसला किया है। नैयर को अकाल तख़्त की 400वीं वर्षगांठ के अवसर पर पत्रकारिता में विशिष्ट योगदान के लिए कमेटी ने सम्मानित किया था। हाल में नैयर ने अपने एक लेख में जरनैल भिंडरावाले की तुलना गुरमीत राम रहीम से की।

इससे उग्रपंथी सिख संगठन भड़क उठे। खासकर दमदमी टकसाल ने गहरी आपत्ति जताई। साफ तौर पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ऐसे तत्वों के दबाव में आ गई। अपनी एक बैठक में यह सम्मान वापस लेना का फैसला लिया गया। कमेटी के अध्यक्ष कृपाल सिंह बडूंगर ने कहा- ‘कुलदीप नैयर ने जिस तरह की शब्दावली इस्तेमाल की, उसके बाद सिख समुदाय में नाराज़गी देखी जा रही थी। इसीलिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी ने उन्हें दिया गया अवॉर्ड वापस ले लिया है।’ इस फैसले से दमदमी टकसाल जैसे संगठन खुश हैं। टकसाल ने कहा कि नैयर ने जरनैल सिंह भिंडरावाले को लेकर जो शब्द इस्तेमाल किए, उससे सिख समुदाय आहत हुआ। अब टकसाल ने सरकार से मांग की है कि नैयर की आत्मकथा 'बिऑन्ड द लाइन्स' पर प्रतिबंध लगाया जाए। उल्लेखनीय है नैयर उन पत्रकारों में हैं, जिन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार और 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान तत्कालीन कांग्रेस सरकार का विरोध किया। तब से सिख समुदाय में उनकी छवि मित्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता की रही है। मगर भिंडरावाले के बारे में उनके विचारों को चरमपंथी सिख नहीं पचा पाए। भिंडरावाले ने दहशतगर्दी का तरीका अपनाकर भारतीय राष्ट्र-राज्य को चुनौती दी थी। तब हालात बिगाड़ने में तत्कालीन कांग्रेस सरकार की कितनी भूमिका रही, यह सार्वजनिक बहस का विषय रहा है। लेकिन एक बिंदु पर भिंडरावाले और उनके साथियों के खिलाफ कार्रवाई अपरिहार्य हो गई, इससे कोई विवेकपूर्ण व्यक्ति इनकार नहीं कर सकता। उस शख्सियत का सम्मान करना अपने आप में आपत्तिजनक है। इसके ऊपर जाकर उसका सम्मान ना करने वाले व्यक्ति के खिलाफ मुहिम छेड़ देना असहिष्णुता की पराकाष्ठा है। यह पंजाब में मौजूद चिंताजनक प्रवृत्तियों की मिसाल भी है। भारतीय राष्ट्र ऐसे रूझानों को स्वीकार नहीं करेगा, यह दो-टूक स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए।

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  1. मै भी कुलदीप नैयर का सम्मान करता हुँ क्योकि वे एक अच्छे पञकार है पर भिडरवाले की तुलना गुरमीत राम रहीम से करना ठीक नही है जिन पञकारो ने उनका इंटरव्यू किया उन से बात करके देख पता चल जाए भिडरवाले को अतकवादी कहा जाता है उन के खिलाफ सबुत को दिखाए अातकवादी होने का वैसे अवार्ड वापस ले के खिलाफ हुँ

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