सरकार और रेज़ीम एक ही चीज नहीं हैं। सरकार लोगों का एक समूह है, जिसके पास सत्ता होती है। जबकि रेज़ीम नियमों की वो व्यवस्था है, जिसके तहत सत्ता पाई जाती है और उसका संचालन होता है।
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त विरोधी वर्तमान आंदोलन ‘रेज़ीम चेंज’ (शासन-तंत्र में परिवर्तन) के लिए है और इसमें कोई बुराई नहीं है। चूंकि उसके कुछ ही रोज पहले भूषण नेता विपक्ष राहुल गांधी के निवास पर एक बैठक में शामिल हुए थे, इसलिए भाजपा को इस बयान में कांग्रेस को घेरने का मौका नजर आया। यहां तक कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तक ने इस वक्तव्य को देश में अराजकता फैला कर सत्ता प्राप्त करने की कांग्रेस की कोशिश का प्रमाण बताया। कांग्रेस ने इसका जवाब यह कह कर दिया कि लोकतंत्र में विपक्ष का काम ही सरकार को बेनकाब करना, विरोध करना और उसे पद से हटाने की कोशिश करना है।
मगर राजनीति-शास्त्र के नजरिए से देखें, तो सरकार और शासन-तंत्र एक ही चीज नहीं हैं। इसके मुताबिक सरकार लोगों का एक खास समूह है, जिसके हाथ में सत्ता होती है। जबकि रेज़ीम (शासन-तंत्र) नियमों की वह व्यवस्था है, जिनके जरिए सत्ता हासिल की जाती है और उसका संचालन किया जाता है। इस अर्थ में देखें तो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा का 2014 में सत्ता में आना रेज़ीम चेंज साबित हुआ है। मोदी तब स्थापित या प्रचलित कायदों के जरिए सत्ता में जरूर आए, लेकिन उनकी सरकार ने सत्ता संचालन की रवायत, संदर्भ बिंदु और अनेक कायदों को बदल डाला है।
एक समझ है यह कि ऐसा कर चुकने के बाद वह सत्ता प्राप्त करने के कायदों को बदलने में जुटी हुई है। धारणा बनी है कि निर्वाचन आयोग इसी मकसद को लागू करने की एजेंसी बन गया है। फिलहाल छिड़ा सियासी आंदोलन इसी शिकायत से उपजा है। अतः ताजा बहस में मुद्दा है कि क्या मोदी विरोधी इस आंदोलन के जरिए पुरानी रवायतों को वापस लाने की बात कर रहे हैं या कोई नई व्यवस्था थोपना चाहते हैं? अगर नई व्यवस्था की बात नहीं है (जैसाकि प्रथम दृष्टि में दिखता है), तो वे असल में रेज़ीम चेंज के बजाय रेज़ीम बहाली की बात कर रहे हैं। इसे अराजकता या संवैधानिक दायरे से बाहर बताना संभवतः असल सूरत की गलत व्याख्या है।
