बीते कुछ वर्षों में अचानक ऐसा क्या हो गया, जिससे भारतीय खाद्य पदार्थ दुनिया में संदेह और एतराज का निशाना बनने लगे हैं? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए अपने अंदर झांकना होगा।
इस शिकायत में सच्चाई हो सकती है कि भारत से खराब संबंधों के कारण ने चीन ने जेनेटिकली मॉडिफाइड होने का आरोप लगाकर भारतीय चावल की कुछ किस्मों का आयात रोका है। मगर, यही बात जापान के भारतीय आमों का आयात रोकने या कई देशों के भारतीय मसालों का आयात रोकने/ घटाने को लेकर नहीं कही जा सकती। वैसे, गुजरे चार वर्षों में मिलावट और गुणवत्ता संबंधी शिकायतों के कारण भारतीय दवाओं पर भारतीय दवाओं के निर्यात पर भी खराब असर पड़ा है। इस दौरान अमेरिका और अफ्रीका के कई देशों ने भारतीय दवाओं की खेप को वापस भेजा या आयात रोक दिया, जिससे भारत की “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” वाली छवि को चुनौती मिली। हालांकि, जापान भारतीय आम का सबसे बड़ा खरीदार नहीं था, लेकिन आम उत्पादकों के मुताबिक उसके प्रतिबंध से दुनिया में बहुत खराब संदेश गया है, जिसका असर आने वाले वर्षों में पड़ सकता है।
इसका कारण जापान का विकसित देश होना और उसके परीक्षण प्रतिमानों की ऊंची छवि है। बहरहाल, मुद्दा है कि बीते कुछ वर्षों में अचानक ऐसा क्या हो गया, जिससे भारतीय उत्पाद दुनिया में संदेह और एतराज का निशाना बनने लगे? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए अपने अंदर झांकना जरूरी है। विशेषज्ञ भारत के कृषि उत्पादों की प्रमाणन व्यवस्था और विकसित देशों के खाद्य सुरक्षा प्रतिमानों के बीच बढ़ती गई खाई की ओर इशारा करते रहे हैं। वहां प्रतिमान समय के साथ विकसित हुए। खासकर कोविड-19 महामारी के बाद अनेक बाजारों में इन पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा है। लेकिन इस दौर में भारत में परीक्षण और प्रमाणन की व्यवस्थाओं को उन्नत नहीं किया गया। जबकि थाईलैंड, वियतनाम, ब्राजील, चिले आदि जैसे अनाज निर्यातकों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांगों के अनुरूप अपने यहां प्रमाणन व्यवस्था बेहतर करने में जरूरी निवेश किया। उन्होंने उत्पादों के जीएमओ मुक्त होने के अधिक विश्वसनीय सर्टिफिकेशन के इंतजाम किए। नतीजतन, भारत की कीमत पर उन देशों के उत्पाद बाजार हासिल कर रहे हैं। दूसरी तरफ भारत में औद्योगिक उत्पादों के निरीक्षण की व्यवस्था अधिक कमजोर एवं भ्रष्टाचार ग्रस्त हुई है। उसका नतीजा अब भुगतना पड़ रहा है।
