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यह एक नई चुनौती

ByNI Editorial,
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यह बात स्वीकार करने की जरूरत है कि तकनीक के विकासक्रम को रोका नहीं जा सकता। जो काम किया जा सकता है, वो यह है कि नई चुनौती के मद्देनजर नीतियां तैयार की जाएं और अर्थव्यवस्था के स्वरूप को नई परिस्थितियों के अनुरूप ढाला जाए।

भारत में शिक्षित बेरोजगारी की समस्या पहले से ही गंभीर है। अब ऊपर से एक नई परिस्थिति आ खड़ी हुई है। खबर है कि जानी-मानी कंपनी वन-97 कम्युनिकेशन लिमिटेड पेटीएम ने अपने सेल्स और इंजीनियरिंग समेत कई विभागों में छंटनी की है। कंपनी प्रवक्ता के मुताबिक आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) अपनाने के कारण सेल्स और इंजीनियरिंग में ज्यादातर नौकरियां प्रभावित हुई हैं। साफ है कि एआई के कारण कंपनियों में ऑटोमेशन की प्रक्रिया काफी तेज होने जा रही है। इससे कंपनियों में उत्पादकता को बढ़ती जाएगी, लेकिन रोजगार के अवसर सिकुड़ेंगे। इससे समाज में गैर-बराबरी और बढ़ेगी। गैर-बराबरी से भी बड़ी समस्या यह है कि चूंकि रोजगार के अवसर कम होते जाएंगे, इसलिए घोर अभाव में जीने वाले लोगों की संख्या बढ़ेगी। एक अमेरिकी शोधकर्ता ने कुछ समय पहले दावा किया था कि आने वाले कुछ ही सालों में एआई इंसान से 80 प्रतिशत तक नौकरियां छीन सकता है। बहरहाल, यह बात स्वीकार करने की जरूरत है कि तकनीक के विकासक्रम को रोका नहीं जा सकता। ना ही आधुनिकतम तकनीक को अपनाने से किसी को रोकना संभव है। जो काम किया जा सकता है, वो यह है कि नई चुनौती के मद्देनजर नीतियां तैयार की जाएं और अर्थव्यवस्था के स्वरूप को नई परिस्थितियों के अनुरूप ढाला जाए। लेकिन यह तभी संभव है, जब इस रूढ़ सोच से नीति निर्माता बाहर निकलें कि अर्थव्यवस्था में सरकार की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। चुनौती यह है कि अगर निजी क्षेत्र तकनीक प्रेरित उत्पादकता वृद्धि के जरिए अपने मुनाफे को बढ़ाने की राह पर जा रहा है, तो सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के जरिए समाज में किस प्रकार का हस्तक्षेप करे, जिससे सभी लोग बुनियादी सुविधाओं के साथ जी सकें। इसके लिए जरूरी होगा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन जैसे क्षेत्रों को फिर से सार्वजनिक क्षेत्र में लिया जाए और वहां विशाल पैमाने पर निवेश हो। सार्वजनिक क्षेत्र में सामाजिक सुरक्षा का मजबूत ढांचा भी खड़ा करना जरूरी होगा। इस मकसद से संसाधन जुटाने के लिए सरकारें चाहें, तो एआई प्रेरित उत्पादकता वृद्धि से बढ़ने वाले मुनाफे पर ऊंचा टैक्स लगा सकती हैं। वरना, सामाजिक अशांति का खतरा बढ़ता जाएगा।

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