तीनों उपचुनावों में किसी समान सूत्र की तलाश करना संभव नहीं है। बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि उपचुनाव स्थानीय सवालों और समीकरणों पर लड़े गए और उनके नतीजे उन मुद्दों से ही तय हुए।
बिहार के बांकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव नतीजों में ‘कॉकरोच’ आंदोलन का असर ढूंढने का लालच होना अपनी जगह ठीक है, लेकिन फिलहाल ऐसे किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। मुमकिन है कि युवा मतदाताओं का एक हिस्सा जंतर-मंतर और 20 जुलाई के संसद मार्च के दौरान जो हुआ, उससे प्रभावित हुआ हो। लेकिन इन नतीजों का विश्लेषण करते वक्त चुनावी राजनीति की पेचीदगियों को ध्यान में रखना उचित नजरिया होगा। बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजे ने जरूर सियासी सनसनी पैदा की है, और इसे बेशक सत्ताधारी भाजपा के लिए बड़ा झटका माना जाएगा। इससे प्रशांत किशोर का चेहरा चमका है और अब लोग उनकी पार्टी को अधिक गंभीरता से लेंगे।
इस रूप में यह राष्ट्रीय जनता दल के लिए भी झटका है। प्रशांत किशोर का सारा दांव राजनीति विमर्श को सांप्रदायिक और जातीय ध्रुवीकरणों से निकालने पर टिका रहा है। वे शिक्षा, पलायन, और आर्थिक पिछेड़ेपन के वो मुद्दे उठा रहे हैं, जिनसे सभी समुदाय प्रभावित हैं। इसके अलावा उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की कथित आपराधिक पृष्ठभूमि, कथित फर्जी डिग्री, और उम्मीदवारी के पर्चों में जानकारी छिपाने के आरोप को भी बड़ा मुद्दा बनाए रखा है। बांकीपुर में उनकी भारी जीत इन मुद्दों के कारगर होने का संकेत है। लेकिन एक शहरी क्षेत्र में- जहां मध्य वर्गीय मतदाता बड़ी संख्या में हैं- मिली सफलता क्या गांव-देहात तक फैल पाएगी, ये बड़ा सवाल अभी कायम है।
उधर मध्य प्रदेश में दतिया सीट को कांग्रेस ने अपने पास बरकरार रखा। इस कारण इस नतीजे में बदलाव की लहर ढूंढना निराधार है। हर जीत महत्त्वपूर्ण होती है, और इस लिहाज से कांग्रेस इस पर जरूर संतोष कर सकती है। मगर असंतोष की तमाम चर्चाओं के बीच गुजरात के मंझलपुर में उसे भाजपा के हाथों करारी हार मिली। इससे पार्टी के सामने मौजूद चुनौतियां फिर जाहिर हुई हैँ। कुल मिलाकर जो सूरत उभरी, उसके बीच तीनों उपचुनावों में किसी समान सूत्र की तलाश करना संभव नहीं है। बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि उपचुनाव स्थानीय सवालों और समीकरणों पर लड़े गए और उनके नतीजे उन मुद्दों से ही तय हुए।
