दुनिया में बदले समीकरणों के बीच एससीओ में प्रभावी देशों के साथ भारत के रुख की दूरी बढ़ती नज़र आई है। इसकी संभवतः सबसे प्रमुख मिसाल चीन की महत्त्वाकांक्षी योजना- बीआरआई है।
शंघाई सहयोग संगठन की शिखर बैठक में कही गई बातों और बिशकेक घोषणापत्र पर गौर करें, तो अहसास होता है कि इस मंच पर भारत की उपस्थिति लगातार असहज होती जा रही है। अब अगले शिखर सम्मेलन की मेजबानी पाकिस्तान को मिली है। दोनों देशों के संबंध के मौजूदा हाल को देखते हुए सवाल उठता है कि क्या वहां होने वाली एससीओ की अनेक बैठकों में भाग लेने भारतीय प्रतिनिधि जाएंगे? वैसे भी दुनिया में बदले समीकरणों के बीच इस मंच में प्रभावी देशों के साथ भारत के रुख की दूरी बढ़ती नज़र आती है। इसकी संभवतः सबसे बड़ी मिसाल चीन की महत्त्वाकांक्षी योजना- बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) है। किर्गिजिस्तान की राजधानी में हुए शिखर सम्मेलन के बाद जारी साझा घोषणापत्र में भारत को फिर उस अनुच्छेद से खुद को अलग रखना पड़ा, जिसमें बीआरआई का समर्थन किया गया है।
आठ सदस्य देशों- बेलारूस, ईरान, कजाखस्तान, किर्गिजिस्तान, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान- ने बीआरआई के प्रति फिर अपना समर्थन जताया। साथ ही इसे यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन (ईएईयू) के साथ जोड़ने की बात भी कही गई। ईएईयू में प्रमुख भूमिका रूस की है। स्पष्टतः बीआरआई एससीओ के आर्थिक और आपसी जुड़ाव (कनेक्टिविटी) एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिखर सम्मेलन में कहा कि कनेक्टिविटी बढ़ाते समय देशों की प्रादेशिक संप्रभुता का ख्याल रखा जाना चाहिए। बीआरआई के तहत निर्मित ‘चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा’ पाकिस्तानी कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर से गुजरता है। इसके अलावा एससीओ में ईरान पर अमेरिका- इजराइल के हमले तथा फिलस्तीन के गज़ा में इजराइल की “विनाशकारी” कार्रवाई भी ऐसे मुद्दे हैं, जहां भारत का रुख एससीओ के बाकी देशों से अलग रहा है। यह अलगाव बिशकेक में भी जाहिर होता रहा। यह साफ है कि चीन, रूस, और ईरान की वैश्विक रणनीति में फिलहाल सामंजस्य बन गया है। बाकी सदस्यों को इस रणनीति पर कोई एतराज नहीं है, हालांकि उनमें से कुछ ने अमेरिकी खेमे के साथ भी अपने दांव जोड़ रखे हैं। स्पष्टतः भारत के लिए यह पुनर्विचार करने का वक्त है कि एससीओ से उसकी क्या अपेक्षाएं हैं और क्या वे पूरी हो रही हैं?
