Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

ऐसे तो ना बोलिये!

New Delhi, November 24 (ANI): Justice Surya Kant takes oath as the 53rd Chief Justice of India (CJI) in the Ganatantra Mandap at Rashtrapati Bhavan, in New Delhi on Monday. (DPR PMO/ANI Photo)

कुछ बेरोजगार फर्जी डिग्रियां हासिल करते हैं, तो फर्जी डिग्री का धंधा चलने देने के लिए जिम्मेदार कौन है? और क्या व्यवस्थाकी कमियों को उजागर करने के लिए आरटीआई कार्यकर्ताओं को अपमान भाव से देखा जाना चाहिए?

कॉकरोच और परजीवी संबंधी अपनी टिप्पणी के बारे में भारत के प्रधान न्यायाधीश ने स्पष्टीकरण दिया है। कहा कि उन्होंने इन शब्दों का उपयोग सभी युवाओं के लिए नहीं- बल्कि उन लोगों के लिए किया, जो फर्जी डिग्रियां लेकर वकील, मीडियाकर्मी या सोशल मीडियाकर्मी बन जाते हैं। बहरहाल, इस सफाई के बावजूद कुछ सवाल रह जाते हैं। क्या प्रधान न्यायाधीश को इस बात की ठोस सूचना है कि देश में फर्जी डिग्री का धंधा चल रहा है? अगर ऐसे लोग उस संस्था में भी हैं, जिसके अभिभावक जस्टिस सूर्य कांत हैं, तो इस बुराई से मुक्त होने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कदम उठाए हैं?

न्यायमूर्ति कांत ने यह टिप्पणी सीनियर लॉयर का दर्जा हासिल करने की कोशिश में लगे एक वकील की याचिका पर सुनवाई करते समय की। अगर चीफ जस्टिस इस तथ्य से आश्वस्त हैं कि उस वकील की डिग्री फर्जी है, तो क्या उसे सिर्फ परजीवी और कोकरोच कहकर जाने देना सही कार्रवाई समझी जाएगी?  स्पष्टीकरण के बाद जस्टिस सूर्य कांत की टिप्पणी इस रूप में हमारे सामने रह जाती हैः कुछ बेरोजगार युवा फर्जी डिग्रियां लेकर सम्मानित पेशों में घुस आते हैं या फिर वे आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं और व्यवस्था पर हमले करने लगते हैं।

किसी भी संदर्भ और किसी के भी खिलाफ सर्वोच्च अदालतों में ऐसे शब्द बोले जाएं, तो यह गहरे अफसोस की बात होगी। देश में करोड़ों बेरोजगारों का होना भारतीय राज्य की नाकामी है। अगर कुछ बेरोजगार फर्जी डिग्रियां हासिल करते हैं, तो सवाल है कि फर्जी डिग्री के धंधे को चलने देने के लिए जिम्मेदार कौन है? और फिर आरटीआई एक्टिविस्ट ‘व्यवस्था’ की कमियों को उजागर करने में जुट जाते हैं, तो इसके लिए क्या उन्हें अपमान भाव से देखा जाना चाहिए? क्या आरटीआई कानून हर भारतीय नागरिक को “आरटीआई एक्टिविस्ट” बनने का अधिकार नहीं देता? भारतीय न्याय व्यवस्था दोष साबित होने तक सबके निर्दोष होने के सिद्धांत पर आधारित है। इल्जाम बिना साबित हुए किसी के लिए अपमानजनक शब्द बोलना क्या संविधान की भावना के अनुरूप है? इन सभी प्रश्नों पर माननीय प्रधान न्यायाधीश को अवश्य विचार करना चाहिए।

Exit mobile version