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सरंक्षण या सरकार का शिकंजा?

भारतीय न्याय

संदेह है कि प्रस्तावित डेटा संरक्षण कानून से नागरिकों के डेटा का संरक्षण तो नहीं होगा, उलटे सूचना का उनका कानूनी अधिकार जरूर सीमित हो जाएगा। आरटीआई के तहत अब तक मांगी जा सकने वाली कई सूचनाएं अब सार्वजनिक होने से बच जाएंगी।

केंद्र सरकार ने विपक्ष के विरोध के बीच लोकसभा में डेटा प्रोटेक्शन बिल को ध्वनि मत से पास करा लिया। राज्यसभा से भी यह बिल पास हो जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन विधेयक को पारित कराते हुए सरकार ने विपक्ष और इस क्षेत्र के जानकारों की चिंताओं का निवारण करने की कोशिश नहीं की है। जबकि यह गंभीर आरोप लगाया गया है कि प्रस्तावित कानून से नागरिकों के डेटा का संरक्षण तो नहीं होगा, उलटे सूचना का उनका कानूनी अधिकार जरूर सीमित हो जाएगा। बिल में प्रावधान कर दिया गया है कि सरकारी पदाधिकारियों का डेटा को संरक्षित किया जाएगा। इस तरह आरटीआई के तहत अब तक मांगी जा सकने वाली कई सूचनाएं अब सार्वजनिक होने से बच जाएंगी। दूसरी तरफ बिल में केंद्र सरकार को कई तरह की छूट दी गई है। इसके तहत सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय संबंधों, व्यवस्था बनाए रखने जैसे मामलों में डेटा सुरक्षा के नियम पालन के लिए बाध्य नहीं होगी और लोगों की व्यक्तिगत जानकारियों का इस्तेमाल कर सकेगी। उधर ऑनलाइन कंपनियों की मुश्किल भी बढ़ेगी।

बिल में कहा गया है कि अगर किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को डेटा सुरक्षा से जुड़े मामले में दो बार सजा सुनाई जाती है, तो इसके बाद सरकार उसे भारत में बैन करने पर भी विचार कर सकती है। डेटा सुरक्षा के उल्लंघन के मामलों में 2.5 अरब रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। प्रस्तावित कानून पत्रकारों के लिए भी नई चुनौतियां खड़ी करेगा। पत्रकार संगठनों का कहना है कि कई मौकों पर पत्रकारों को लोगों की व्यक्तिगत जानकारियां सार्वजनिक करनी पड़ती हैं। इस बिल के कानून बनने के बाद ऐसा करना जोखिम भरा हो जाएगा। पत्रकारों और मीडिया घरानों पर इस कानून के तहत कार्रवाई का खतरा मंडराता रहेगा। सरकार का दावा है कि यह कानून नागरिकों के डेटा को संरक्षित करने के लिए बनाया जा रहा है। मगर बिल के प्रावधानों से ऐसा भरोसा नहीं बंधा है। बेहतर होता कि सरकार सभी हित-धारकों की चिंताओं का निवारण करने के बाद यह बिल संसद में लाती। लेकिन आज के दौर में ऐसी अपेक्षा करना कुछ ज्यादा मांगने जैसा हो गया है।

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