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हकीकत से आंख मिलाएं

राजनाथ सिंह

New Delhi, May 13 (ANI): Defence Minister Rajnath Singh holds a meeting with Defence Secretary Rajesh Kumar Singh, Chief of Defence Staff General Anil Chauhan, Navy Chief Admiral Dinesh Kumar Tripathi and Chief of the Army Staff General Upendra Dwivedi, in New Delhi on Tuesday. (ANI Photo)

जनरल चौहान ने आगाह किया है कि विदेशी तकनीक पर निर्भरता से हमारी तैयारी कमजोर पड़ती है। इस कारण (रक्षा) उत्पादन बढ़ाने की हमारी क्षमता सीमित हो जाती है। नतीजा महत्त्वपूर्ण पाट-पुर्जों की कमी के रूप में सामने आता है।

एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह और थल सेना के लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर. सिंह के बाद अब चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) अनिल चौहान ने कुछ ऐसी बातें कहीं हैं, जिनका रक्षा तैयारियों के लिहाज से गहरा महत्त्व है। गौरतलब है कि इन तीनों बड़े अधिकारियों ने ये टिप्पणियां ऑपरेशन सिंदूर के बाद की हैं। इसलिए यह अनुमान लगाने का आधार बनता है कि उस दौरान भारतीय सेना को हुए अनुभवों की झलक उनके वक्तव्यों में है। जनरल चौहान ने ध्यान खींचा है कि युद्ध की प्रकृति बदल गई है। उन्होंने आगाह किया कि आज के युद्ध को भविष्य की तकनीक से जीता जा सकता है, गुजरे हुए कल की तकनीक से नहीं।

इसी सिलसिले में उनकी ये टिप्पणी खास महत्त्व रखती हैः ‘विदेशी तकनीक पर निर्भरता से हमारी तैयारी कमजोर पड़ती है और इस कारण (रक्षा) उत्पादन बढ़ाने की हमारी क्षमता सीमित हो जाती है। इसका नतीजा निर्णायक महत्त्व के पाट-पुर्जों की कमी के रूप में सामने आता है, जिससे उनकी लगातार आपूर्ति नहीं हो पाती।’ जनरल चौहान ने युद्ध में ड्रोन्स के बढ़ते महत्त्व का उल्लेख किया। कहा कि भारत के लिए ड्रोन तकनीक में आत्म-निर्भरता ना सिर्फ रणनीतिक लिहाज से जरूरी है, बल्कि अपनी नियति को तय करने, अपने हितों की रक्षा और भविष्य के अवसरों का लाभ उठाने के लिए भी यह आवश्यक है।

आधुनिक युद्धों के विशेषज्ञ ऐसी जरूरतों पर पहले से जोर देते रहे हैं। साथ ही उन्होंने साइबर और अंतरिक्ष क्षमताओं के युद्ध में बढ़ते उपयोग का जिक्र भी किया है। जिन देशों ने इन तकनीकों में माहिर देशों का संरक्षण हासिल कर रखा है, वे बिना इनमें आत्म-निर्भरता हासिल किए फिलहाल खुद को सुरक्षित महसूस कर सकते हैं। लेकिन भारत जैसे बड़े और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को अहमियत देने वाले देश के पास यह विकल्प नहीं है। उसके पास एकमात्र विकल्प आधुनिक तकनीकों में खुद आत्म-निर्भर बनने का है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने इस दिशा में अग्रसोची होने की जिम्मेदारी नहीं निभाई। बहरहाल, अब जबकि चीजें साफ हैं, इस दिशा में आगे ना बढ़ना राष्ट्र-हित से समझौता करना होगा।

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