इस वर्ष के एनवायरॉनमेंट परफॉर्मेंस इंडेक्स में भारत को 22.46 अंक मिले, जिसकी बदौलत 177 देशों की सूची में वह 176वें नंबर पर आया है। दो साल पहले भी भारत का यही दर्जा था।
भारतवासियों को अपने बिगड़ते पर्यावरण के बारे में जानने के लिए शायद ही किसी अंतरराष्ट्रीय सचूकांक की जरूरत है। अतः इस वर्ष के पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में अगर सिर्फ एक देश- लाओस- भारत से नीचे आया, तो उस पर शायद ही किसी को अचरज हुआ हो। अमेरिका के येल और कोलंबिया विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिक हर दो साल पर एनवायरॉनमेंट परफॉर्मेंस इंडेक्स (ईपीआई) तैयार करते हैं। यह सूचकांक पर्यावरणीय सेहत, पारिस्थितिकीय जीवंतता, और जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए उठाए गए कदमों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जाता है।
इसके लिए संबंधित वैज्ञानिक उपग्रह सहित विभिन्न स्रोतों से आंकड़े इकट्ठा करते हैँ। फिर वे अधिकतम 100 के पैमाने पर विभिन्न देशों को अंक देते हैँ। इस बार भारत को 22.46 अंक मिले, जिसकी बदौलत 177 देशों की सूची में वह 176वें नंबर पर आया। दो साल पहले भी भारत का यही दर्जा था। लेकिन तब केंद्र सरकार ने सूचकांक को ‘अवैज्ञानिक और अनुमानों पर आधारित’ बता कर ठुकरा दिया था। लेकिन ऐसी प्रतिक्रियाएं हवा में घुलते प्रदूषण, नदियों के नाले में बदलते जाने, खेतों की मिट्टी में केमिकल्स की बढ़ती मात्रा, निर्माण कार्यों में पर्यावरण संरक्षण के नियमों की खुलेआम अनदेखी और इन नियमों के प्रति सरकार, बल्कि अब तो न्यायपालिका के रुख में भी बढ़ती अगंभीरता पर परदा नहीं डाल सकतीं।
इसी हफ्ते एक अखबारी रिपोर्ट में बताया गया कि राष्ट्रीय वन्य जीवन बोर्ड के सामने पिछले एक दशक में मंजूरी के लिए आई परियोजनाओं में से 96.5 प्रतिशत (1876 में से 1810) को तुरंत हरी झंडी दे दी गई। आरोप है कि ज्यादातर प्रस्तावों को बिना पूरी पड़ताल के आगे बढ़ा दिया गया। 2017 में केंद्र ने परियोजनाओं पर अमल के बाद पर्यावरण मंजूरी लेने का रास्ता खोला था, जिसका लाभ अनेक बड़ी कंपनियां उठा रही हैं। इस बीच गुजरात के पिपावाव पोर्ट विस्तार परियोजना में पर्यावरण क्षति की शिकायत करने वाले पर्यावरण कार्यकर्ता को सुप्रीम कोर्ट में यह फटकार सुननी पड़ी कि हर परियोजना रोक दी गई, तो फिर देश विकसित कैसे होगा? जब ऐसा नजरिया हावी हो, तो वैज्ञानिकों की रिपोर्ट को “अवैज्ञानिक” बताना कौतुक ही पैदा करता है।
