मोदी सरकार के साथ दिक्कत यह है कि संवाद से अधिकतम सहमति बनाने के बजाय वह ऐसी एकतरफा एवं एकांगी पहल कर देती है, जिससे जनता के बहुत बड़े हिस्सों के प्रभावित होने की संभावना रहती है।
केंद्र का यह बयान सटीक है कि कोई बड़ा देश अपने यहां अनियंत्रित एवं अनियमित विदेशी अनुदान की इजाजत नहीं देता। बेशक, विदेशी चंदा हमेशा भलमनसाहत या मानवीय भावना से प्रेरित होकर नहीं दिया जाता। इसके जरिए, खासकर विकासशील देशों में नीतियों एवं राजनीति को प्रभावित करने की शिकायतें भरपूर मौजूद रही हैं। इसलिए नरेंद्र मोदी सरकार संसदीय प्रक्रिया के जरिए विदेशी अनुदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) में बदलाव लाना चाहती है, तो उसके इस संप्रभु अधिकार को चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके बावजूद उसकी इस पहल को लेकर सिविल सोसायटी और अल्पसंख्यकों- खासकर ईसाई समुदाय में आशंकाएं गहराई हैं, तो उसकी वजह सरकार के नजरिए में छिपी है।
मोदी सरकार के साथ दिक्कत यह है कि संवाद से अधिकतम सहमति बनाने के लोकतांत्रिक जतन में उतरने के बजाय वह एकतरफा एवं एकांगी ढंग से ऐसी पहल कर देती है, जिससे जनता के बहुत बड़े हिस्सों के प्रभावित होने की संभावना रहती है। फिर यही हुआ है। सरकार के अनुसार प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य विदेशी धन का दुरुपयोग रोकना, पारदर्शिता बढ़ाना, और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना है। अगर सचमुच ऐसा है, तो इन मकसदों पर आखिर किसे आपत्ति होगी? सरकार अगर साफ मंशा के साथ सभी हितधारकों से खुला संवाद करती, तो वह बेहतर ढंग से अपने उद्देश्य को उन्हें समझाते हुए उनका भरोसा हासिल कर सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया, जिससे यह पहल विवादास्पद हो गई है।
निर्विवाद रूप से एफसीआरए संशोधन विधेयक- 2026 में विदेशी फंडिंग पाने वाले गैर-सरकारी संगठनों और धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों तथा उनके कामकाज पर सरकारी नियंत्रण से संबंधित नए कड़े प्रावधान हैं। सबसे बड़ा विवाद संपत्तियों को सरकारी नियंत्रण में लेने के प्रावधान पर है। इसके अनुसार किसी संगठन का एफसीआरए लाइसेंस रद्द होता है या रीन्यू नहीं होता है, तो विदेशी चंदे से बनी उसकी संपत्तियां सरकारी प्राधिकरण के पास चले जाएंगी। हालांकि अब सरकार ने कहा है कि ऐसा पिछली तारीख से नहीं होगा, लेकिन उससे आशंकाएं दूर नहीं हुई हैं। अतः बेहतर होगा कि संशोधनों को लागू करने के पहले इनको लेकर वह समाज में भरोसे का माहौल तैयार करे।
