फाइनल में अर्जेंटीना की टीम ना सिर्फ खराब खेली और हारी, बल्कि उसने शर्मनाक व्यवहार भी किया, इससे लायोनेल मेसी की विरासत दागदार हुई है। लेकिन कुल मिलाकर दागदार फुटबॉल का पूरा प्रशासन हुआ है।
डॉनल्ड ट्रंप के दौर में अमेरिका के अंदर और बाहर नियम-कायदों और मर्यादा को तार-तार करने गहराती गई संस्कृति का पूरा साया उसकी मेजबानी में हुए दुनिया के सबसे खेल आयोजन- यानी फुटबॉल कप पर नजर आया। 39 दिन तक चले टूर्नामेंट के दौरान ये धारणा फैली कि इस टूर्नामेंट पर ट्रंप युग और ट्रंपीय कायदों का साया पड़ा हुआ है। ट्रंप की इच्छाओं के आगे फीफा के घुटने टेकने और रेफरी तथा वीडियो एस्टिटैंट रेफरी (वीएआर) के लगातार अविश्वसनीय एवं खराब निर्णयों ने ऐसे संदेहों को लगातार बल प्रदान किया। स्वाभाविक है कि ऐसे फैसलों से बार-बार लाभान्वित हुई अर्जेंटीना की टीम बहुत से फुटबॉल प्रेमियों के गुस्से का निशाना बनी।
इस हद तक कि पहली बार ऐसा हुआ, जब बीच प्रतियोगिता के दौरान किसी टीम (अर्जेंटीना) को टूर्नामेंट से निकालने के लिए ऑनलाइन मुहिम चलाई गई, जिस अर्जी पर 60 लाख से ज्यादा लोगों ने दस्तखत किए। ये कथन आम हो गया कि अर्जेंटीना के खिलाफ मैदान में उतरी टीम को रेफरी और फीफा का भी मुकाबला करना पड़ रहा है। संभवतः अर्जेंटीना के खिलाड़ी भी मानने लगे कि उनकी पीठ पर “किसी” का हाथ है! तभी फाइनल मैच में स्पेन से 1-0 से हार को गले उतारना उनके लिए कठिन हुआ और खेल के सबसे बड़े मंच पर वे मारपीट पर उतारू हो गए। उचित ही उनके हिंसक व्यवहार की फुटबॉल की दुनिया में व्यापक रूप से निंदा की गई है।
यह सब अपनी उम्दा कलाबाजी के लिए मशहूर, इतिहास के महानतम खिलाड़ियों में से एक- लायोनेल मेसी के नेतृत्व में हुआ, जिससे उनके करोड़ों प्रशंसकों को ठेस पहुंची है। फाइनल मैच में उनकी टीम ना सिर्फ खराब खेली और पराजित हुई, बल्कि उसने शर्मनाक व्यवहार भी किया, इससे मेसी की विरासत दागदार हुई है। लेकिन कुल मिलाकर दागदार फुटबॉल का पूरा प्रशासन हुआ है। फीफा इस पर खुश है कि उसने इस टूर्नामेंट के जरिए आमदनी का रिकॉर्ड बनाया है, लेकिन अनेक देशों की फुटबॉल एसोसिएशन और करोड़ों प्रशंसक इस ‘खूबसूरत खेल’ के सबसे बड़े टूर्नामेंट का बदसूरत आयोजन करने की उसकी भूमिका को लेकर फिलहाल विचलित हैं।
