परीक्षा व्यवस्था का भ्रष्ट होना समस्या का सिर्फ एक पहलू है। शिक्षा का उत्तरोत्तर महंगा होना और ऊंची डिग्रियों के बावजूद रोजगार मिलने की संभावना न्यूनतम बने रहना- इससे जुड़े कहीं ज्यादा बड़े प्रश्न हैं।
छात्र- युवा आंदोलित इसलिए हुए, क्योंकि अपने अंधकारमय होते भविष्य से उलझने के लिए उन्हें अकेले छोड़ दिया गया था। अब चूंकि उनके आक्रोश की ताकत दिख चुकी है, तो राजनीतिक दलों की रणनीति में वे खासे अहम हो गए हैं। खबर है कि केंद्र सरकार ने ‘एक दिन, एक यूनिवर्सिटी’ कार्यक्रम तय किया है, जिसके तहत हर रोज कोई ना कोई केंद्रीय मंत्री किसी विश्वविद्यालय में जाकर छात्रों की बात सुनेगा और उन्हें सरकारी योजनाओं के बारे में बताएगा। उधर कांग्रेस ने अपने ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को 800 शहरों तक ले जाने का इरादा जताया है, जिनमें से कई जगह राहुल गांधी भी शामिल होंगे। पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में गांधी ने कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को निर्देश दिया कि वे महीने भर के अंदर दोष-मुक्त परीक्षा आयोजित करने की कार्य-योजना पेश करें।
उधर पटना में ‘कॉकरोच’ आंदोलन पर हुए दमन के विरोध में तेजस्वी यादव सड़क पर उतरे। तो सूरत यह बनी है कि विपक्षी दल छात्रों के आक्रोश को खुद से जोड़कर सत्ता पक्ष के लिए सवालों के घेरे को और कसने की रणनीति अपना रहे हैं। भाजपा ने अपनी सोशल मीडिया टीम के पुनर्गठन, जेन-ज़ी के मुताबिक प्रचार सामग्रियां ढालकर और सरकार की कथित कल्याण योजनाओं पर छात्र-युवाओं से संवाद कर इसका जवाब देने की तैयारी की है। एक नजरिए से यह अच्छी बात है कि मौजूदा हाल से निराश युवा राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के केंद्र में आ रहे हैँ।
मगर, सवाल यही है कि क्या निराशा के मूलभूत कारणों तक पहुंचने का प्रयास भी हो रहा है? परीक्षा व्यवस्था का भ्रष्ट होना समस्या का सिर्फ एक पहलू है। शिक्षा व्यवस्था का उत्तरोत्तर महंगा होते जाना और ऊंची डिग्रियां लेने के बावजूद रोजगार मिलने की संभावना न्यूनतम बने रहना- इससे जुड़े कहीं ज्यादा बड़े प्रश्न हैं। इन मुद्दों का संबंध अर्थव्यवस्था की आम दिशा से जुड़ता है। इसलिए बहस वहां पहुंचनी चाहिए। राजनीतिक दल अगर अपनी सीमाओं के कारण इसे वहां ले जाकर समाधान पेश नहीं करते, तो युवा असंतोष को ना वे अपने दायरे में समेट पाएंगे, ना ही इसे नियंत्रित नहीं किया जा सकेगा।
