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सुधार या भूल सुधार?

बुधवार को अपनी बैठक में जीएसटी काउंसिल विधि समिति के प्रस्तावों पर अपनी मुहर लगाने पर अगर सहमत होती है, तो उसे सुधार के बजाय एक भूल सुधार के रूप में ही देखा जाएगा।

जीएसटी काउंसिल की विधि समिति ने इस कर व्यवस्था को सरल बनाने के लिए कुछ सुझाव दिए हैं, जिन्हें सत्ता पक्ष ने बड़े ‘सुधार’ के रूप में पेश किया है। हालांकि अभी तय नहीं है कि बुधवार को अपनी बैठक में जीएसटी काउंसिल इन प्रस्तावों पर अपनी मुहर लगाएगी या नहीं, लेकिन अगर ऐसा होता भी है, तो इन्हें भूल सुधार के रूप में ही देखा जाएगा। यह बात कभी तर्कपूर्ण मालूम नहीं पड़ी की रोजमर्रा के आम कारोबार में होने वाली भूल-चूक को संगीन अपराध जैसा माना जाए और उस जैसे ही दंड के प्रावधान कर दिए जाएं। जीएसटी की उलझाऊ रखी गई प्रक्रिया के बीच ऐसे ही प्रावधानों के कारण इस कर व्यवस्था आम कारोबार पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाला समझा गया है।

अब विधि समिति ने सुझाव दिया है कि जीएसटी से जुड़े “अपराधों” में मुकदमा चलाने की सीमा पांच करोड़ रुपये से बढ़ा कर 10 करोड़ रुपये कर दिया जाए। यानी 10 करोड़ से कम की कर-चोरी के आरोप पर आपराधिक मुकदमा ना चले। साथ ही अधिकतम कैद की अवधि कम करने का प्रस्ताव भी है। अदालतों को यह तय करने में अधिक विवेकाधिकार देने की सिफारिश की गई है कि किसी मामले में केवल जुर्माना लगे, कैद सुनाई जाए या दोनों सजाएं दी जाएं। विधि समिति ने माना है कि जीएसटी कानून के तहत गिरफ्तारी और अभियोजन से जुड़े प्रावधानों में अलग- अलग राज्यों और अधिकारियों के बीच अलग- अलग व्याख्याएं सामने आई हैं।

अतः अब इस बारे में अधिक स्पष्टता लाने का सुझाव दिया गया है। मगर खबर है कि समिति में इस पर पूरी सहमति नहीं थी कि जीएसटी अधिकारियों के पास गिरफ्तारी की शक्ति आगे रहे या नहीं। इसलिए जीएसटी काउंसिल इस बारे में किसी आम निर्णय पर पहुंच पाएगी, इसको लेकर संदेह बना हुआ है। बहरहाल, यह कहा जाएगा कि देर से ही सही, लेकिन अब सरकारी स्तर पर जीएसटी को भयमुक्त व्यवस्था बनाने की दिशा में सोचने की जरूरत महसूस की गई है। बेहतर होगा, जीएसटी काउंसिल इसमें हिचक ना दिखाए, बल्कि और आगे बढ़ कर इसे सरल एवं सुविधाजनक बनाने का निर्णय ले।

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