ताजा आय कर आंकड़ों से सामने आया है कि ‘अति-समृद्ध’ लोगों की संख्या में भारी उछाल आया है। स्पष्टतः यह देश में कुछ ही हाथों में तेजी से धन केंद्रित होते जाने का ठोस प्रमाण है।
इनकम टैक्स रिटर्न के ताजा आंकड़ों ने भारत में बढ़ती गैर-बराबरी की फिर पुष्टि की है। बेशक, रिटर्न फाइल करने वालों की संख्या बढ़ी है और प्रत्यक्ष कर की उगाही बढ़ी है, लेकिन इन आंकड़ों ने बढ़ती विषमता और कर प्रणाली की ढांचागत कमजोरियों पर भी रोशनी डाली है। फिर सामने आया है कि फाइल होने वाले अधिकांश रिटर्न में शून्य कर देनदारी होती है। उसके बाद न्यूनतम इनकम स्लैब में आने वाले व्यक्तियों का स्थान होता है। जबकि वास्तविक करदाताओं की संख्या यथावत (लगभग ढाई करोड़) बनी हुई है।
ताजा आंकड़ों से यह जरूर सामने आया कि 100 करोड़ रुपये से अधिक की वार्षिक आय घोषित करने वाले ‘अति-समृद्ध’ लोगों की संख्या में भारी उछाल आया है। स्पष्टतः यह प्रमाण है कि देश में धन तेजी से कुछ ही हाथों में केंद्रित होता जा रहा है। आयकर आंकड़ों से उभरा सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि प्रत्यक्ष करों का सबसे बड़ा हिस्सा वेतनभोगी वर्ग से आता है। यह प्रमाण है कि आयकर से संबंधित व्यवस्थागत समस्याएं अभी भी कायम हैं। आमदनी के स्रोत पर ही टैक्स काट लिए जाने की प्रणाली के कारण वेतनभोगी कर्मचारी अपनी आय छिपा नहीं सकते। इसके विपरीत यह आम धारणा है कि कई गैर-वेतनभोगी पेशेवरकर्मी (डॉक्टर, वकील आदि) असल आय की जानकारी नहीं देते और वास्तविक देनदारी से कम टैक्स चुकाते हैं।
एक और आंकड़ा गौरतलब हैः वित्त वर्ष 2025-26 में व्यक्तिगत आय कर के रूप में 12.41 लाख करोड़ रुपये की वसूली हुई, जबकि कॉरपोरेट टैक्स का योगदान 10.99 लाख करोड़ रुपये ही रहा। 2021-22 में व्यक्तिगत आय कर के जरिए हुई उगाही कॉरपोरेट टैक्स से हुई वसूली को पार कर गई थी। तब से ये ट्रेंड बढ़ता ही चला गया है। नतीजतन, उपभोक्ता बाजार में अपेक्षित विस्तार ना होने के बावजूद कॉरपोरेट मुनाफा तेजी से बढ़ा है। यह 2019 में अपनाई गई नीति का परिणाम है, जब केंद्र ने कॉरपोरेट टैक्स की दरों में भारी कटौती कर दी थी। इस तरह सरकार ने अपनी आमदनी घटाई, जिसकी भरपाई वह ऐसे उपायों से करती आई है, जिसका आनुपातिक रूप से अधिक बोझ आम जनता पर पड़ता है।
