निर्यात में वृद्धि अच्छी खबर है, लेकिन उसे अपनी अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को छिपाने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए। अर्थव्यवस्था की बुनियाद को दुरुस्त करने की जरूरत लगातार बनी हुई है।
सघन होती आर्थिक चुनौतियों के बीच यह अच्छी खबर आई कि बीते अप्रैल–अगस्त में भारत का वस्तु निर्यात 17.9 फीसदी बढ़ कर 215.9 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। चीन को भारत से हुए निर्यात में 38.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। जबकि इस अवधि में चीन से हुए आयात में 27 प्रतिशत ही वृद्धि हुई। बहरहाल, इन संतोषजनक आंकड़ों के बावजूद कुछ बातें ऐसी हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है। गौरतलब है कि अप्रैल- अगस्त के दौरान निर्यात में 32.7 अरब डॉलर की हुई वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा कमोडिटीज की बढ़ी हुई कीमतों और आयात निर्भर उत्पादों से आया है। यह ध्यान में रखना चाहिए कि महंगाई के कारण निर्यात से प्राप्त विदेशी मुद्रा में बढ़ोतरी होती है, तो आयात पर उसी अनुपात में खर्च भी करना पड़ता है।
यह हकीकत बनी हुई है कि भारत अधिक निर्यात कर रहा है, लेकिन निर्यातित वस्तुओं के उत्पादन के लिए वह आयात भी ज्यादा कर रहा है। अधिकांशतः यह आयात चीन से होता है। इसलिए चीन पर भारत की निर्भरता बढ़ती जा रही है। दूसरी कड़वी हकीकत है कि रोजगार पैदा करने वाले निर्यात में गिरावट आई है। अप्रैल-अगस्त की अवधि में चाय के निर्यात में 15.5 प्रतिशत, तंबाकू में 7.8, मसालों में 7.4, और फल-सब्जियों में 10.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। इसी तरह रेडीमेड कपड़ों का निर्यात 9.1 फीसदी, चमड़े से निर्मित वस्तुओं का 4.3, और सिरेमिक एवं कांच के सामान का निर्यात 21.6 फीसदी गिर गया।
ये क्षेत्र महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये करोड़ों किसानों, श्रमिकों, और छोटे व्यवसायियों की आजीविका का जरिया हैं। एक और पहलू को जरूर ध्यान में रखना चाहिए। बढ़े निर्यात का एक प्रमुख कारण रुपये की कीमत में भारी गिरावट भी है। मसलन, डॉलर के संदर्भ में जहां निर्यात 17.9 फीसदी बढ़ा, वहीं रुपये में यह वृद्धि 30.3 प्रतिशत दर्ज हुई। आयात में भी यही अनुपात जाहिर हुआ। तात्पर्य यह कि निर्यात में वृद्धि अच्छी खबर है, लेकिन उसे अपनी अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को छिपाने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए। अर्थव्यवस्था की बुनियाद को दुरुस्त करने की जरूरत लगातार बनी हुई है।
