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मुसीबत की निशानियां

इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों को छोड़ दें, तो बाकी लगभग हर क्षेत्र में निर्यात गिरा है। ऐसे में उत्पादन संबंधी हालात का गंभीर होना लाजिमी है। फरवरी में युवा बेरोजगारी की दर चार महीने के सबसे ऊपरी स्तर पर पहुंच गई।

फरवरी में भारत का व्यापार घाटा पिछले वर्ष के इसी महीने की तुलना में लगभग दो गुना हो गया। जनवरी से तुलना करें, तो व्यापार घाटे में लगभग सात बिलियन डॉलर गिरावट आई, मगर ऐसा निर्यात के साथ-साथ आयात में भी बड़ी गिरावट के कारण हुआ। जिन देशों में भारतीय वस्तुओं की मांग गिरी, उनमें अमेरिका भी है। यानी रूसी तेल आयात संबंधी टैरिफ हटाने और तथाकथित जैसे को तैसा आयात शुल्क 25 से 18 प्रतिशत करने के ट्रंप प्रशासन के फैसले से भारतीय कारोबार को कोई राहत नहीं मिली। ऐसा संभवतः इसलिए हुआ कि अन्य देशों को मिली राहत ने उनके उत्पादों को भारतीय वस्तुओं की तुलना में अधिक सस्ता बना दिया है। तो जनवरी की तुलना में फरवरी में अमेरिका के लिए भारतीय निर्यात 12.9 प्रतिशत गिर गया।

दरअसल, चीन को छोड़कर तमाम महत्त्वपूर्ण बाजारों के लिए भारतीय निर्यात में गिरावट आई। सिर्फ चीन के लिए भारतीय निर्यात 32.4 प्रतिशत बढ़ा, मगर वहां से आयात भी 30.5 फीसदी बढ़ गया। इस तरह चीन से पहले जारी भारी व्यापार घाटे को पाटने में ज्यादा मदद नहीं मिली। पिछले अप्रैल से इस वर्ष फरवरी तक चीन से व्यापार घाटा 102 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है, जबकि इसके पहले के वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह 99 बिलियन डॉलर था। तो कुल मिलाकर विदेश व्यापार में भारत की चिंता बढ़ती जा रही है।

इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों को छोड़ दें, तो बाकी लगभग हर क्षेत्र में निर्यात गिर रहा है। स्विट्जरलैंड, यूएई आदि जैसे जिन देशों से मुक्त व्यापार समझौते हुए हैं, उनसे व्यापार घाटा और बढ़ा है। ऐसे में देश के अंदर उत्पादन की स्थितियों का गंभीर होना लाजिमी है। फरवरी में युवा बेरोजगारी की दर चार महीने के सबसे ऊपरी स्तर पर पहुंच गई, जबकि सरकारी परिभाषा में जिस युवा को हफ्ते में घंटे भर का भी काम मिल जाए, उसे बेरोजगार नहीं माना जाता। ऐसे में असल बेरोजगारी का अंदाजा लगाया जा सकता है। दरअसल, ज्यादातर हालिया आर्थिक आंकड़े बढ़ रही मुसीबत का संकेत दे रहे हैं। ये आंकड़े गुलाबी सूरत के सरकारी कथानक में लगातार छिद्र कर रहे हैं।

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