न्यूजीलैंड से भारत का मुक्त व्यापार समझौता होना महत्त्वपूर्ण है। इसके जरिए दोनों देश दुनिया को एक ठोस संदेश भेज रहे हैं। मगर जहां तक आर्थिक फायदों का संबंध है, तो इस करार से भारत को सीमित लाभ ही होगा।
आज के दौर में जब मुक्त बाजार की पैरोकार अर्थव्यवस्थाएं अपने दरवाजे पर लगातार रुकावटें खड़ी कर रही हैं, न्यूजीलैंड से भारत का मुक्त व्यापार समझौता होना महत्त्वपूर्ण है। बेशक इसके जरिए दोनों देश दुनिया को एक ठोस संदेश भेज रहे हैं। मगर जहां तक आर्थिक फायदों का संबंध है, तो इस करार से भारत को सीमित लाभ ही होगा। न्यूजीलैंड लगभग 53 लाख की आबादी वाला छोटा-सा देश है, पिछले साल जिसकी सकल अर्थव्यवस्था 278.6 बिलियन डॉलर की थी। बहरहाल, वहां की प्रति व्यक्ति जीडीपी 52 हजार डॉलर से ऊपर है, जिससे वहां का उपभोग स्तर ऊंचा है तथा वह विकसित देश की श्रेणी में आता है।
पिछले साल भारत ने 71.11 करोड़ डॉलर का निर्यात न्यूजीलैंड को किया, जो 2024 की तुलना में 32.1 प्रतिशत ज्यादा था। उधर भारत ने 58.71 करोड़ डॉलर का आयात किया, जो साल भर पहले की तुलना में 75.2 प्रतिशत अधिक था। यानी नई वैश्विक परिस्थितियों के बीच दोनों देशों में कारोबार की गति पहले ही तेज हो चुकी है। न्यूजीलैंड में भारतीय उत्पादों पर औसतन 2.2 प्रतिशत आयात शुल्क लगता रहा है, हालांकि लगभग 450 महत्त्वपूर्ण वस्तुओं पर ये दर 10 फीसदी थी। अब ये शुल्क शून्य हो जाएगा। न्यूजीलैंड सरकार के मुताबिक भारत के लिए उसके 95 प्रतिशत निर्यातों पर से टैरिफ या तो हटेगा या उसमें भारी कटौती होगी।
वैसे, भारत दुग्ध एवं कृषि उत्पादों सहित कई वस्तुओं पर टैरिफ जारी रखेगा। इस पर न्यूजीलैंड को राजी कर लेना भारत सरकार की बड़ी सफलता है। करार के तहत भारत के 5000 कुशल कर्मियों को तीन साल तक न्यूजीलैंड में अपना कारोबार चलाने की इजाजत मिलेगी। 1000 भारतीय नौजवानों को वहां हर साल मल्टी एंट्री वीजा मिलेगा। यह सहमति भी बनी है कि अगले 15 साल में न्यूजीलैंड भारत में 20 बिलियन डॉलर का निवेश करेगा। वैसे, असल में निवेश मौजूद परिस्थितियों पर निर्भर करता है, इसलिए ऐसी सहमतियों का व्यावहारिक अर्थ कम ही होता है। बहरहाल, फिलहाल भारत ने मुक्त व्यापार समझौतों को प्राथमिकता दे रखी है। उस नजरिए से कहा जा सकता है कि ताजा करार से एक और मुकाम हासिल हुआ है।
